सावन / श्रावण मास
भगवान शिव को समर्पित पवित्र मास
परिचय
सावन मास, जिसे श्रावण मास भी कहते हैं, हिन्दू धर्म में अत्यंत पवित्र माना जाता है और यह भगवान शिव को समर्पित है। यह मास शिव भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है, क्योंकि इस दौरान भगवान शिव की पूजा-अर्चना और व्रत रखने से मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। सावन का महीना प्रकृति के नवजीवन और आध्यात्मिक शुद्धता का प्रतीक है।
तिथि / समय
उत्तर भारत (पूर्णिमांत पंचांग): 30 जुलाई 2026 (गुरुवार) से 28 अगस्त 2026 (शुक्रवार, श्रावण पूर्णिमा) तक।
दक्षिण व पश्चिम भारत (अमांत पंचांग — आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु): 13 अगस्त से 11 सितंबर 2026 तक।
नेपाल (विक्रम संवत 2083): 16 जुलाई से 16 अगस्त 2026 तक।
2026 में चार सावन सोमवार पड़ेंगे: 3, 10, 17 और 24 अगस्त (उत्तर भारत के अनुसार)।
पूजा सामग्री
- जल
- दूध
- बेलपत्र
- धतूरा
- भांग
- चंदन
- अक्षत
- फूल
- फल
- धूप
- दीप
पूजा विधि
- **सावन सोमवार व्रत:** प्रत्येक सोमवार को प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। शिव मंदिर जाकर शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा, भांग, चंदन, अक्षत, फूल और फल अर्पित करें। शिव चालीसा या शिव स्तोत्र का पाठ करें। दिन भर उपवास रखें और शाम को फलाहार ग्रहण करें।
- **मंगला गौरी व्रत:** सावन के प्रत्येक मंगलवार को देवी पार्वती की पूजा की जाती है। इस दिन सुहागिन स्त्रियाँ पति की दीर्घायु और सौभाग्य के लिए व्रत रखती हैं।
- **प्रदोष व्रत:** त्रयोदशी तिथि को भगवान शिव और माता पार्वती की विशेष पूजा की जाती है। यह व्रत शिव कृपा प्राप्त करने के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है।
- **कांवड़ यात्रा:** शिव भक्त हरिद्वार, गोमुख या अन्य पवित्र तीर्थों से गंगाजल भरकर कांवड़ में लाते हैं और पैदल यात्रा करते हुए अपने क्षेत्र के शिव मंदिर में जलाभिषेक करते हैं।
- **रुद्राभिषेक व महामृत्युंजय जाप:** इस मास में भगवान शिव का रुद्राभिषेक करना और 'ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्' मंत्र का जाप करना अकाल मृत्यु के भय को दूर करने और ग्रह दोषों के निवारण हेतु अत्यंत प्रभावी माना गया है।
मंत्र
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
हम तीन नेत्रों वाले भगवान शिव की पूजा करते हैं, जो सुगंधित हैं और सभी प्राणियों का पोषण करते हैं। जैसे ककड़ी अपनी बेल से सहजता से अलग हो जाती है, वैसे ही हमें मृत्यु के बंधन से मुक्त करें, परंतु अमरता से नहीं।
कथा
सावन मास की उत्पत्ति समुद्र मंथन की पौराणिक कथा से जुड़ी है, जिसका विस्तृत वर्णन विष्णु पुराण, भागवत पुराण और शिव पुराण जैसे प्रमुख धर्मग्रंथों में मिलता है।
पौराणिक कथा के अनुसार, देवताओं और असुरों ने मिलकर अमरत्व की प्राप्ति के लिए क्षीरसागर का मंथन किया था। इस महामंथन में मंदराचल पर्वत को मथानी और वासुकि नाग को रस्सी के रूप में प्रयोग किया गया। मंथन के दौरान चौदह बहुमूल्य रत्न एक-एक करके प्रकट हुए, परंतु सबसे पहले 'हलाहल' नामक एक अत्यंत भयंकर विष निकला। यह विष इतना तीव्र था कि इसकी ज्वाला से संपूर्ण सृष्टि के भस्म होने का खतरा उत्पन्न हो गया।
सृष्टि को इस विनाश से बचाने के लिए, भगवान शिव ने उस हलाहल विष को स्वयं पी लिया। विष को कंठ में ही रोकने के लिए देवी पार्वती ने उनके गले को कसकर पकड़ लिया, जिससे विष उनके शरीर में नहीं फैल सका और उनका कंठ नीला पड़ गया। इसी कारण भगवान शिव को 'नीलकंठ' के नाम से भी जाना जाता है। विष के प्रभाव से उत्पन्न अत्यधिक ताप को शांत करने के लिए, समस्त देवताओं ने शिव पर जल और गंगाजल अर्पित किया। शिव पुराण के अनुसार, यह महत्वपूर्ण घटना श्रावण मास में ही घटित हुई थी। इसी स्मृति में श्रावण मास में शिवलिंग पर जल और दूध चढ़ाने की परंपरा — जिसे जलाभिषेक या रुद्राभिषेक कहा जाता है — आरंभ हुई।
'श्रावण' नाम की व्युत्पत्ति भी शास्त्रों में वर्णित है। इस मास की पूर्णिमा को चंद्रमा 'श्रवण' नक्षत्र में स्थित होता है, जिसे भगवान विष्णु का जन्म नक्षत्र माना जाता है। इसी नक्षत्र के नाम पर इस मास का नाम 'श्रावण' पड़ा, जिसे उत्तर भारत में बोलचाल की भाषा में 'सावन' कहा जाता है।
एक अन्य प्रचलित कथा के अनुसार, देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए इसी श्रावण मास में कठोर तपस्या की थी। इसी पावन स्मृति में सावन के प्रत्येक मंगलवार को 'मंगला गौरी व्रत' रखा जाता है, जो विशेष रूप से सुहागिन स्त्रियों के लिए सौभाग्य और पति की दीर्घायु का प्रतीक माना जाता है।
फल एवं महत्व
शिव पुराण के अनुसार, सावन मास में की गई प्रार्थनाएँ और पूजा-अर्चना भगवान शिव तक विशेष रूप से त्वरित और सशक्त होकर पहुँचती हैं। इस मास में उपवास और शिव पूजा से मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं, विवाह में आने वाली बाधाएँ दूर होती हैं और मनचाहा जीवनसाथी प्राप्त होता है। यह मास ग्रह दोषों — विशेषकर शनि, राहु-केतु से उत्पन्न कष्टों — के निवारण हेतु अत्यंत प्रभावी माना गया है। सावन के नियमों का पालन आध्यात्मिक अनुशासन के साथ-साथ शारीरिक स्वास्थ्य और संतुलित जीवनशैली को भी बढ़ावा देता है।
क्षेत्रीय विविधता
उत्तर भारत में (पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार) सावन मास की तिथियाँ दक्षिण व पश्चिम भारत (अमांत पंचांग) से भिन्न होती हैं। नेपाल में इसे 'सौन' कहा जाता है और पशुपतिनाथ मंदिर में विशेष रुद्राभिषेक होता है। श्रावण पूर्णिमा के दिन ही रक्षाबंधन, नारली पूर्णिमा और गायत्री जयंती जैसे पर्व भी मनाए जाते हैं।
संदर्भ स्रोत
विष्णु पुराण, भागवत पुराण, शिव पुराण