निर्जला एकादशी व्रत एवं पूजा विधि

भीमसेनी एकादशी के नाम से विख्यात

परिचय

ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी के नाम से जाना जाता है। यह सभी एकादशियों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि इस एक एकादशी का व्रत करने से वर्ष भर की सभी चौबीस एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होता है। इस व्रत को भीमसेनी एकादशी भी कहते हैं, क्योंकि महाभारत काल में महाबली भीम ने भी इस व्रत को किया था और इसके पुण्य फल को प्राप्त किया था।

तिथि / समय

ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को यह व्रत किया जाता है। यह एकादशी ग्रीष्म ऋतु में आती है, जब जल की आवश्यकता अधिक होती है, इसलिए इस व्रत का महत्व और भी बढ़ जाता है।

पूजा सामग्री

  • भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र
  • पीले वस्त्र
  • तुलसी दल
  • पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल का मिश्रण)
  • फल (केला, आम आदि)
  • पुष्प (पीले रंग के विशेषतः)
  • धूप, दीप
  • चंदन, रोली
  • मिठाई (विशेषतः पीली)
  • नैवेद्य
  • गंगाजल
  • कलश

पूजा विधि

  1. दशमी तिथि की रात्रि से ही सात्विक भोजन ग्रहण करें और ब्रह्मचर्य का पालन करें।
  2. एकादशी के दिन प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  3. भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें कि मैं निर्जला एकादशी का व्रत पूर्ण श्रद्धा से करूंगा।
  4. एक चौकी पर भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। उन्हें पीले वस्त्र अर्पित करें।
  5. पंचामृत से स्नान कराएं और फिर शुद्ध जल से स्नान कराएं।
  6. चंदन, रोली, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से भगवान का पूजन करें। तुलसी दल अवश्य अर्पित करें।
  7. भगवान विष्णु के मंत्र 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का यथाशक्ति जाप करें।
  8. पूरे दिन अन्न और जल का त्याग करें। यदि संभव न हो तो केवल आचमन के लिए एक बूंद जल ग्रहण कर सकते हैं।
  9. रात्रि में जागरण करें और भगवान विष्णु के भजन-कीर्तन करें।
  10. द्वादशी तिथि को प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर भगवान विष्णु का पूजन करें।
  11. ब्राह्मणों को भोजन कराएं और अपनी सामर्थ्य अनुसार वस्त्र, अन्न, दक्षिणा आदि का दान करें।
  12. तत्पश्चात् शुभ मुहूर्त में जल ग्रहण करके व्रत का पारण करें।

मंत्र

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

मैं भगवान वासुदेव को नमस्कार करता हूँ।

निर्जला एकादशी की कथा का आरंभ

एक बार महर्षि व्यास ने पांडवों को चारों पुरुषार्थों - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - को देने वाले एकादशी व्रत का विधान बताया। भीमसेन ने कहा, “हे मुनिवर! आप तो जानते हैं कि मैं भोजन के बिना नहीं रह सकता। मुझसे एक समय भी भोजन त्यागा नहीं जाता। मैं अग्नि नामक वायु से पीड़ित रहता हूँ, अतः मैं प्रत्येक एकादशी को उपवास नहीं कर सकता। आप कृपा करके मुझे कोई ऐसा व्रत बताएं, जिसके करने से मुझे वर्ष भर की सभी एकादशियों का फल प्राप्त हो जाए और मुझे अधिक कष्ट भी न उठाना पड़े।”

महर्षि व्यास का उपदेश

तब महर्षि व्यास ने कहा, “हे भीमसेन! ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की जो एकादशी आती है, उसका नाम निर्जला है। इस एकादशी के दिन अन्न और जल का पूर्ण रूप से त्याग करके व्रत करना चाहिए। जो मनुष्य इस निर्जला एकादशी का व्रत करता है, उसे वर्ष भर की सभी चौबीस एकादशियों का फल प्राप्त होता है। यह एकादशी व्रत करने से मनुष्य सभी पापों से मुक्त होकर भगवान विष्णु के परमधाम को प्राप्त होता है। इस दिन स्नान करके भगवान विष्णु का पूजन करें और 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करें।

भीमसेन द्वारा व्रत का पालन

महर्षि व्यास ने आगे कहा, “हे भीमसेन! इस दिन जल का त्याग करना ही इस व्रत की विशेषता है। यदि आप जल का त्याग नहीं कर सकते तो केवल आचमन के लिए जल ग्रहण कर सकते हैं, परंतु वह भी केवल एक बूंद के बराबर ही होना चाहिए। इस व्रत के प्रभाव से आप सभी पापों से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त होंगे।” महर्षि व्यास के इन वचनों को सुनकर भीमसेन ने इस निर्जला एकादशी का व्रत किया और इसके पुण्य फल को प्राप्त किया। तभी से यह एकादशी भीमसेनी एकादशी के नाम से भी प्रसिद्ध हुई।

पारण

निर्जला एकादशी का पारण द्वादशी तिथि को सूर्योदय के पश्चात् करना चाहिए। पारण हमेशा शुभ मुहूर्त में ही करें। पारण के लिए जल ग्रहण करके व्रत खोलें और फिर अन्न ग्रहण करें। पारण से पूर्व ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान दक्षिणा देना शुभ माना जाता है।

फल एवं महत्व

निर्जला एकादशी का व्रत करने से मनुष्य को समस्त पापों से मुक्ति मिलती है और वह भगवान विष्णु के परमधाम को प्राप्त होता है। इस एक एकादशी का व्रत करने से वर्ष भर की सभी चौबीस एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त हो जाता है। यह व्रत दीर्घायु, आरोग्य, धन-धान्य और मोक्ष प्रदान करने वाला है। जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन करता है, उसे मृत्यु के पश्चात् यमदूतों का भय नहीं रहता और वह सीधे विष्णुलोक को जाता है। इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति को सभी तीर्थों के स्नान का फल प्राप्त होता है।

संदर्भ स्रोत

पद्म पुराण, धर्मसिंधु, कल्याण (एकादशी माहात्म्य)