रथ यात्रा (जगन्नाथ पुरी)

जगन्नाथ पुरी की विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा का विस्तृत विवरण

परिचय

रथ यात्रा, जिसे गुंडिचा यात्रा भी कहा जाता है, भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की वार्षिक यात्रा है। यह हिन्दू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण और भव्य त्योहारों में से एक है, जो ओडिशा के पुरी में आयोजित होता है। इस यात्रा का वर्णन स्कंद पुराण, ब्रह्म पुराण, पद्म पुराण और कपिल संहिता जैसे प्राचीन धर्मग्रंथों में मिलता है। स्कंद पुराण के अनुसार, यह भगवान जगन्नाथ की बारह यात्राओं में सबसे प्रमुख मानी जाती है, जो भक्तों को अपार पुण्य और मोक्ष प्रदान करती है।

यह उत्सव केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और समानता का भी प्रतीक है, जहाँ हर जाति, धर्म और राष्ट्रीयता के लोग भगवान के रथ को खींचने और उनके दर्शन करने के लिए एक साथ आते हैं।

तिथि / समय

रथ यात्रा का मुख्य उत्सव आषाढ़ शुक्ल द्वितीया तिथि को होता है। इसके साथ जुड़े अन्य महत्वपूर्ण अनुष्ठान इस प्रकार हैं:

* **नबयौवन दर्शन:** रथ यात्रा से ठीक एक दिन पहले, स्नान पूर्णिमा के बाद देवताओं के एकांतवास (अनासर) की अवधि समाप्त होने पर। (उदाहरण: 15 जुलाई 2026, बुधवार)
* **मुख्य रथ यात्रा:** आषाढ़ शुक्ल द्वितीया तिथि को। (उदाहरण: 16 जुलाई 2026, गुरुवार)
* **बहुड़ा यात्रा (वापसी यात्रा):** रथ यात्रा के आठवें दिन, जब भगवान अपने मौसी के घर से वापस जगन्नाथ मंदिर लौटते हैं। (उदाहरण: 24 जुलाई 2026, शुक्रवार)
* **सुना बेशा (स्वर्ण वेश):** बहुड़ा यात्रा के अगले दिन, जब देवताओं को स्वर्ण आभूषणों से सजाया जाता है। यह परंपरा राजा कपिलेंद्र देव द्वारा 1460 ई. में युद्ध विजय के बाद स्वर्ण अर्पण से आरंभ हुई थी। (उदाहरण: 25 जुलाई 2026, शनिवार)
* **नीलाद्रि बिजय (गर्भगृह प्रवेश):** देवताओं का गर्भगृह में पुनः प्रवेश, जो रथ यात्रा के लगभग 12-13 दिन बाद पूर्ण होता है। (उदाहरण: 28 जुलाई 2026 तक)

पूजा विधि

  1. **स्नान पूर्णिमा:** रथ यात्रा से लगभग 35 दिन पूर्व ज्येष्ठ पूर्णिमा को देवताओं को 108 कलशों के पवित्र जल से स्नान कराया जाता है।
  2. **अनासर:** स्नान के बाद, देवता 'अस्वस्थ' माने जाते हैं और 15 दिनों के लिए एकांतवास में रहते हैं। इस अवधि में सामान्य दर्शन बंद रहते हैं, और देवताओं को विशेष औषधीय उपचार दिया जाता है।
  3. **पहंडी:** रथ यात्रा के दिन, देवताओं को गर्भगृह से रथों तक झूमते हुए, लयबद्ध ढंग से ले जाया जाता है। यह एक अत्यंत भावनात्मक और ऊर्जावान जुलूस होता है।
  4. **छेरा पहरा:** पुरी के गजपति महाराज स्वयं सोने की झाड़ू से रथों और उनके मार्ग को साफ करते हैं। यह अनुष्ठान इस संदेश को दर्शाता है कि ईश्वर के समक्ष राजा और साधारण भक्त सभी समान हैं।
  5. **हेरा पंचमी:** रथ यात्रा के छठे दिन, देवी लक्ष्मी (भगवान जगन्नाथ की पत्नी) गुंडिचा मंदिर पहुँचकर भगवान से रूठने और उनके रथ के एक हिस्से को प्रतीकात्मक रूप से क्षति पहुँचाने की लीला करती हैं।
  6. **बहुड़ा यात्रा:** वापसी यात्रा के दौरान, मौसी माँ मंदिर पर भगवान जगन्नाथ को पोड़ा पीठा (चावल और नारियल से बना एक विशेष पकवान) का भोग लगाया जाता है, जो उन्हें अत्यंत प्रिय है।
  7. **रथ निर्माण:** तीनों रथ प्रतिवर्ष नए सिरे से पवित्र काष्ठ से बनाए जाते हैं। भगवान जगन्नाथ का रथ 'नंदीघोष' (16 पहिए, 44 फुट ऊँचाई), बलभद्र जी का 'तालध्वज' (14 पहिए, 43 फुट ऊँचाई), और सुभद्रा जी का 'दर्पदलन' (12 पहिए, 42 फुट ऊँचाई) कहलाता है। रथों को खींचने वाली रस्सियों के भी नाम हैं — शंखचूड़ (जगन्नाथ), वासुकि (बलभद्र) और स्वर्णचूड़ (सुभद्रा)।

कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, मालवा नरेश राजा इंद्रद्युम्न को एक स्वप्न में भगवान विष्णु के नीलमाधव स्वरूप के दर्शन हुए। उन्हें पता चला कि भगवान पुरी के समुद्र तट पर एक वृक्ष के नीचे प्रकट हुए हैं। राजा ने खोज करवाई तो समुद्र तट पर एक दिव्य काष्ठ (दारु) बहकर आया। स्वप्नादेश के अनुसार, इसी पवित्र काष्ठ से भगवान की मूर्तियाँ बनवाई जानी थीं।

स्वयं भगवान विश्वकर्मा एक वृद्ध शिल्पकार के वेश में प्रकट हुए और उन्होंने मूर्तियाँ बनाने का कार्यभार संभाला। उन्होंने एक शर्त रखी कि जब तक वे मूर्ति निर्माण पूर्ण न कर लें, कोई भी उस कक्ष का द्वार न खोले। कुछ समय बाद, रानी गुंडिचा अत्यधिक उत्सुक हो गईं और उन्होंने द्वार खोल दिया। द्वार खुलते ही शिल्पकार अंतर्धान हो गए और मूर्तियाँ अपूर्ण रह गईं — उनके हाथ-पैर नहीं बने थे। यही वर्तमान में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की अपूर्ण मूर्तियों का रहस्य है।

गुंडिचा मंदिर, जो रानी गुंडिचा के नाम पर है, को भगवान जगन्नाथ की मौसी का घर माना जाता है। इसी कारण प्रतिवर्ष भगवान अपने भाई-बहन के साथ वहाँ यात्रा करते हैं। इस संरचित उत्सव का प्रारंभ 12वीं शताब्दी में पूर्वी गंग वंश के राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव द्वारा जगन्नाथ मंदिर के निर्माण के समय से माना जाता है, यद्यपि रथ यात्रा की परंपराएँ इससे भी प्राचीन हैं।

फल एवं महत्व

स्कंद पुराण के अनुसार, रथ की रस्सी को एक बार भी खींचने का पुण्य सौ यज्ञों के फल के समान है। रथ पर विराजमान भगवान जगन्नाथ के दर्शन मात्र से, रथ की रस्सी को छूने से, अथवा शोभायात्रा के साथ चलने मात्र से अनेक जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं और भक्तों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

बामदेव संहिता के अनुसार, जो भक्त गुंडिचा मंदिर में सप्ताह भर विराजमान चारों देवताओं (जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन) के दर्शन करते हैं, वे अपने पितरों सहित बैकुंठ धाम को प्राप्त होते हैं। रथ यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता इसकी समरसता है — वर्ष के अन्य दिनों में जगन्नाथ मंदिर में केवल हिंदुओं को प्रवेश की अनुमति है, परन्तु रथ यात्रा के दिन जाति, धर्म व राष्ट्रीयता से परे प्रत्येक व्यक्ति दर्शन व रथ स्पर्श कर सकता है। यह सामाजिक समरसता व समानता का एक महान प्रतीक है।

संदर्भ स्रोत

स्कंद पुराण, ब्रह्म पुराण, पद्म पुराण, कपिल संहिता, बामदेव संहिता