कालसर्प दोष

कालसर्प योग

कालसर्प दोष क्या है

जब जन्म-कुंडली के सातों ग्रह (सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि) राहु और केतु के एक ही ओर, अर्थात उनके बीच के अर्धवृत्त में आ जाएँ, तब कालसर्प दोष बनता है। राहु-केतु किन भावों में हैं, इसी से इसके बारह प्रकार (अनन्त, कुलिक, वासुकि आदि) कहे जाते हैं।

शास्त्र इसे क्यों देखता है

राहु-केतु छाया ग्रह हैं और सभी ग्रहों का उनके एक ओर आ जाना कुंडली में एकपक्षीय बल दर्शाता है — शास्त्र में इससे प्रयासों में विलंब व उतार-चढ़ाव की संभावना कही गई है।

भंग / परिहार — कब दोष शमित माना जाता है

  • यदि कोई एक ग्रह भी राहु-केतु की धुरी से बाहर हो तो पूर्ण कालसर्प नहीं बनता (आंशिक माना जाता है)।
  • राहु अथवा केतु पर गुरु की दृष्टि होने से दोष का बल घटता है।
  • बलवान लग्नेश तथा शुभ योग होने पर इसका प्रभाव सीमित रहता है।

शास्त्र-सम्मत उपाय

राहु बीज मंत्र — ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः तथा केतु बीज मंत्र — ॐ स्रां स्रीं स्रौं सः केतवे नमः। शनिवार को जौ व नारियल का दान, तथा शिव-आराधना (महामृत्युंजय जप) शास्त्र-सम्मत उपाय हैं।

एक आवश्यक बात

कालसर्प को लेकर लोक में जितना भय फैलाया जाता है, उतना शास्त्रीय आधार उसका नहीं है। यह एक ग्रह-विन्यास है — कुंडली के शेष योग, दशा व बल देखे बिना इसका फल नहीं कहा जा सकता।

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अपनी कुंडली में देखें

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