पितृ दोष

पितृ ऋण

पितृ दोष क्या है

कुंडली में सूर्य, राहु अथवा शनि का नवम भाव (भाग्य व पितृ-स्थान) अथवा नवमेश से पीड़ित संबंध बनने पर पितृ दोष कहा जाता है। कुछ परम्पराओं में सूर्य-राहु की युति को भी इसका मुख्य लक्षण माना गया है।

शास्त्र इसे क्यों देखता है

नवम भाव पितरों व पूर्वजों का स्थान है। शास्त्र में इसे पूर्वजों के अपूर्ण कार्यों अथवा अनदेखे कर्तव्यों से जोड़ा गया है — इसीलिए इसका उपाय भी तर्पण व सेवा-प्रधान है, न कि कोई शुल्क-आधारित अनुष्ठान।

भंग / परिहार — कब दोष शमित माना जाता है

  • नवमेश बलवान हो अथवा उस पर गुरु की दृष्टि हो तो दोष क्षीण होता है।
  • नियमित पितृ-तर्पण व श्राद्ध-कर्म से शमन कहा गया है।

शास्त्र-सम्मत उपाय

अमावस्या को पितृ तर्पण, ॐ पितृभ्यः नमः का जप, तथा पितृपक्ष में श्राद्ध-कर्म। अन्न व वस्त्र का दान भी शास्त्र-सम्मत है।

एक आवश्यक बात

पितृ दोष का उपाय भय नहीं, कृतज्ञता है — तर्पण, सेवा व दान। किसी महँगे अनुष्ठान की अनिवार्यता शास्त्र नहीं कहता।

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