मंगल दोष (मांगलिक)
मांगलिक दोष · कुज दोष · भौम दोष
मंगल दोष (मांगलिक) क्या है
जन्म-कुंडली में मंगल यदि लग्न से 1, 4, 7, 8 अथवा 12वें भाव में स्थित हो तो उसे मंगल दोष अथवा मांगलिक कहा जाता है। कुछ परम्पराओं में यही गणना चन्द्र-लग्न तथा शुक्र से भी की जाती है — तीनों में से जितनों से दोष बने, उसी अनुपात में उसका बल माना जाता है।
शास्त्र इसे क्यों देखता है
मंगल पराक्रम, ऊर्जा व आवेग के कारक हैं। सप्तम (दांपत्य) व अष्टम (आयु) भाव से इनका संबंध बनने पर शास्त्र दांपत्य-जीवन में उग्रता व मतभेद की संभावना बताता है — इसीलिए विवाह-मिलान में इसे देखा जाता है।
अंशिक बनाम पूर्ण मंगल दोष (मांगलिक)
अंशिक (आंशिक) मांगलिक वह स्थिति है जब दोष लग्न, चन्द्र व शुक्र — तीनों में से केवल एक-दो से बने, अथवा मंगल ऐसे भाव/राशि में हो जहाँ उसका बल स्वतः क्षीण हो (जैसे स्वराशि, उच्च, अथवा गुरु-दृष्ट)। पूर्ण मांगलिक की तुलना में इसका प्रभाव मृदु माना जाता है और अधिकांश परिहार सरलता से लागू हो जाते हैं। जितनी लग्नों (लग्न/चन्द्र/शुक्र) से दोष बने, उसी अनुपात में उसका बल आँका जाता है।
भंग / परिहार — कब दोष शमित माना जाता है
- दोनों जातकों की कुंडली में मंगल दोष हो — तब दोष परस्पर शमित माना जाता है।
- मंगल स्वराशि (मेष अथवा वृश्चिक) अथवा उच्च राशि (मकर) में हों।
- मंगल पर गुरु की दृष्टि हो अथवा गुरु-मंगल की युति हो।
- कुछ परम्पराओं में 28 वर्ष की आयु के पश्चात दोष का बल क्षीण माना जाता है।
शास्त्र-सम्मत उपाय
मंगलवार को हनुमान चालीसा व सुंदरकांड का पाठ, मसूर व गुड़ का दान, तथा मंगल बीज मंत्र — ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः (108 बार)।
एक आवश्यक बात
मंगल दोष अकेले विवाह का निर्णय नहीं कर सकता। शास्त्र में इसके इतने परिहार दिए गए हैं कि पूर्ण कुंडली-परीक्षण के बिना केवल मंगल की स्थिति देखकर किसी संबंध को अस्वीकार करना उचित नहीं माना गया।
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अपनी कुंडली में देखें
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