देवउठनी एकादशी 2026 — शनिवार, 21 नवंबर 2026

Dev Uthani Ekadashi · कार्तिक मास · 43 दिन बाद

देवउठनी एकादशी 2026 कब है?

देवउठनी एकादशी 2026 में शनिवार, 21 नवंबर 2026 को है — आज से 43 दिन बाद।

कार्तिक शुक्ल एकादशी — विष्णु का योगनिद्रा से जागरण; इसी दिन से मांगलिक कार्य पुनः आरंभ होते हैं।

देवउठनी एकादशी का महत्व

कार्तिक शुक्ल एकादशी — विष्णु का योगनिद्रा से जागरण; इसी दिन से मांगलिक कार्य पुनः आरंभ होते हैं।

यह पर्व कार्तिक मास में पड़ता है। हिन्दू पर्व सौर तिथि पर नहीं, चन्द्र-तिथि पर तय होते हैं — इसीलिए हर वर्ष अंग्रेज़ी कैलेंडर में इनकी तारीख़ बदलती है। यहाँ दी गई तिथि खगोलीय गणना (लाहिरी अयनांश) से निकाली गई है, किसी सूची से नहीं।

देवउठनी एकादशी 2026 — पूजा का शुभ समय

सूर्योदय06:48
सूर्यास्त17:25
अभिजीत मुहूर्त11:45 – 12:28
ब्रह्म मुहूर्त05:12 – 06:00
राहुकाल (टालें)09:27 – 10:47
पारण (द्वादशी में)06:49 – 09:19 (22 नवंबर 2026)

समय नई दिल्ली के सूर्योदय-सूर्यास्त पर गणना किए गए हैं — अपने शहर का समय देखें। यह गणना खगोलीय है, किसी संग्रहीत सारणी से नहीं ली गई — और प्रचलित पंचांगों से मिलाकर जाँची गई है (गणना-सत्यापित)।

देवउठनी एकादशी पूजा-विधि

  1. प्रातः स्नान कर घर-आँगन में रंगोली बनाएँ।
  2. सायंकाल भगवान विष्णु का शालिग्राम रूप में पूजन करें।
  3. गन्ना, सिंघाड़ा, आँवला व ऋतुफल अर्पित करें।
  4. शंख-घंटी बजाकर 'उठो देव' कहकर विष्णु को योगनिद्रा से जगाएँ।
  5. तुलसी-शालिग्राम विवाह करें; इसी दिन से मांगलिक कार्य पुनः आरंभ होते हैं।

देवउठनी एकादशी पूजा सामग्री

शालिग्राम/विष्णु मूर्ति, तुलसी, गन्ना, सिंघाड़ा, आँवला, ऋतुफल, दीप, गेरू, धूप

देवउठनी एकादशी व्रत के नियम व विधि

इसी दिन भगवान विष्णु चातुर्मास की निद्रा से जागते हैं और मांगलिक कार्य पुनः आरंभ होते हैं। तुलसी-शालिग्राम विवाह इसी संध्या को सम्पन्न किया जाता है। व्रत में अन्न वर्जित है; पारण द्वादशी को सूर्योदय के पश्चात्।

पूजा व मंत्र

विष्णु की आराधना इस पर्व का केंद्र है। मंत्र — ॐ नमो भगवते वासुदेवाय (108 बार जप)।

जप की गिनती हेतु ऑनलाइन जप-माला का उपयोग किया जा सकता है।

संबंधित पाठ व पर्व

देवउठनी एकादशी की कथा

पद्म व स्कन्द पुराण की परम्परा में भगवान विष्णु आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी) को क्षीरसागर में योगनिद्रा में जाते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी को जागते हैं — इन्हीं चार मासों को चातुर्मास कहा गया है, जिनमें विवाह आदि मांगलिक कार्य रोक दिए जाते हैं। जागरण की इसी तिथि को देवउठनी या प्रबोधिनी एकादशी कहते हैं, और इसी दिन से विवाह-मुहूर्त पुनः आरंभ होते हैं। इसी दिन तुलसी-विवाह की परम्परा है: वृंदा की अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें वर दिया कि तुलसी-रूप में वे सदा उनके साथ पूजी जाएँगी — इसीलिए तुलसी के बिना विष्णु-भोग अपूर्ण माना जाता है। गन्ने का मंडप बनाकर तुलसी व शालिग्राम का विवाह कराया जाता है।

देवउठनी एकादशी — क्षेत्रीय परम्पराएँ

ब्रज व उत्तर भारत में तुलसी-विवाह के साथ गन्ने का मंडप; महाराष्ट्र में तुलसी विवाह से विवाह-ऋतु का आरंभ; पंढरपुर की कार्तिकी वारी इसी काल में; दक्षिण में इसे उत्थान एकादशी कहते हैं।

देवउठनी एकादशी — आने वाले वर्षों की तिथियाँ

2025रविवार, 2 नवंबर 2025
2026शनिवार, 21 नवंबर 2026
2027बुधवार, 10 नवंबर 2027
2028शनिवार, 28 अक्टूबर 2028
2029शुक्रवार, 16 नवंबर 2029

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