दुर्गा सप्तशती
तीन चरित्र (गीताप्रेस विनियोग): प्रथम (अध्याय १) — देवता महाकाली, ऋषि ब्रह्मा, छन्द गायत्री, शक्ति नन्दा, बीज रक्तदन्तिका; मध्यम (अध्याय २–४) — देवता महालक्ष्मी, ऋषि विष्णु, छन्द उष्णिक्, शक्ति शाकम्भरी, बीज दुर्गा; उत्तम (अध्याय ५–१३) — देवता महासरस्वती, ऋषि रुद्र, छन्द अनुष्टुप्, शक्ति भीमा, बीज भ्रामरी। (ऐं-ह्रीं-क्लीं नवार्ण मन्त्र के बीज/शक्ति/कीलक हैं, चरित्रों के नहीं।) ७०० मन्त्रों की गणना: ५३७ श्लोक + ३८ अर्धश्लोक + ६६ खण्ड-श्लोक + ५७ उवाच + २ पुनरुक्त (परम्परागत गणना)।
तेरह अध्याय
- अध्याय १ — मधु-कैटभ वध (१०४ श्लोक, प्रथम चरित्र — महाकाली)
राजा सुरथ (राज्य छिन गया) और वैश्य समाधि (परिवार ने त्याग दिया) मेधा ऋषि के आश्रम में मिलते हैं और पूछते हैं कि मोह क्यों नहीं छूटता। ऋषि बताते हैं कि यह महामाया का प्रभाव है — 'ज्ञानिनामपि चेतांसि…'। कथा: प्रलय में विष्णु योगनिद्रा में हैं; उनके कान के मैल से मधु-कैटभ उत्पन्न होकर ब्रह्मा को मारने दौड़ते हैं; ब्रह्मा योगनिद्रा की स्तुति (तन्त्रोक्त रात्रिसूक्त) करते हैं; देवी विष्णु को जगाती हैं और असुरों को मोहित करती हैं; विष्णु जंघा पर उनका वध करते हैं। - अध्याय २ — महिषासुर की सेना का वध (देवी का प्राकट्य) (६९ श्लोक, मध्यम चरित्र — महालक्ष्मी)
महिषासुर इन्द्र को हराकर स्वर्ग छीन लेता है। देवताओं के क्रोध से निकले तेज से देवी प्रकट होती हैं; सब देवता उन्हें अपने आयुध व आभूषण देते हैं; हिमालय सिंह देते हैं। देवी के अट्टहास से युद्ध आरम्भ; चिक्षुर, चामर आदि सेनापतियों सहित असुर-सेना का संहार। - अध्याय ३ — सेनापतियों सहित महिषासुर वध (४४ श्लोक, मध्यम चरित्र — महालक्ष्मी)
चिक्षुर, चामर, उदग्र, कराल, उद्धत, बाष्कल, ताम्र, अन्धक, उग्रास्य, उग्रवीर्य, महाहनु, बिडाल, दुर्धर, दुर्मुख आदि का वध। महिषासुर भैंसा, सिंह, पुरुष, हाथी रूप बदलता है; देवी मधु-पान कर 'गर्ज गर्ज क्षणं मूढ…' कहकर उसे पैर से दबाकर शूल से बेधती हैं और खड्ग से सिर काटती हैं। - अध्याय ४ — शक्रादि स्तुति (इन्द्रादि देवताओं द्वारा स्तुति) (४२ श्लोक, मध्यम चरित्र — महालक्ष्मी)
महिषासुर-वध के बाद इन्द्र आदि देवता देवी की स्तुति करते हैं — 'दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः…'। देवी वर देती हैं कि संकट में स्मरण करने पर वे रक्षा करेंगी, और अन्तर्धान होती हैं। - अध्याय ५ — देवताओं द्वारा स्तुति; शुम्भ का दूत (१२९ श्लोक, उत्तर चरित्र — महासरस्वती)
शुम्भ-निशुम्भ से पीड़ित देवता हिमालय पर 'नमो देव्यै महादेव्यै…' और 'या देवी सर्वभूतेषु…' से स्तुति करते हैं। पार्वती के शरीर (कोश) से अम्बिका (कौशिकी) प्रकट होती हैं; पार्वती कृष्णवर्णा होकर कालिका कहलाती हैं। चण्ड-मुण्ड उनके सौन्दर्य का वर्णन शुम्भ से करते हैं; शुम्भ दूत सुग्रीव को विवाह-प्रस्ताव लेकर भेजता है; देवी शर्त रखती हैं — जो युद्ध में मुझे जीते, वही पति। - अध्याय ६ — धूम्रलोचन वध (२४ श्लोक, उत्तर चरित्र — महासरस्वती)
क्रोधित शुम्भ धूम्रलोचन को ६०,००० असुरों सहित भेजता है; देवी के हुंकार मात्र से धूम्रलोचन भस्म; सिंह सेना का संहार करता है। - अध्याय ७ — चण्ड-मुण्ड वध (२७ श्लोक, उत्तर चरित्र — महासरस्वती)
चण्ड-मुण्ड सेना लेकर आते हैं; अम्बिका के ललाट से कराल-वदना काली प्रकट होती हैं; वे सेना को निगल जाती हैं और चण्ड-मुण्ड के सिर काटती हैं; देवी उन्हें 'चामुण्डा' नाम देती हैं। - अध्याय ८ — रक्तबीज वध (६३ श्लोक, उत्तर चरित्र — महासरस्वती)
शुम्भ सम्पूर्ण सेना भेजता है; ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नारसिंही, ऐन्द्री आदि मातृ-शक्तियाँ और शिवदूती प्रकट होती हैं। रक्तबीज के रक्त की हर बूँद से नया असुर; काली (चामुण्डा) रक्त पी जाती हैं और देवी रक्तबीज का वध करती हैं। - अध्याय ९ — निशुम्भ वध (४१ श्लोक, उत्तर चरित्र — महासरस्वती)
राजा सुरथ के प्रश्न पर ऋषि आगे कहते हैं — निशुम्भ भीषण युद्ध करता है; देवी उसका वध करती हैं; उसके हृदय से निकला दूसरा पुरुष भी मारा जाता है। - अध्याय १० — शुम्भ वध (३२ श्लोक, उत्तर चरित्र — महासरस्वती)
शुम्भ कहता है — तुम दूसरों के बल पर लड़ती हो; देवी कहती हैं — 'एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा' (इस जगत् में मैं एक ही हूँ) और सब शक्तियों को अपने में लीन कर लेती हैं। आकाश में युद्ध के बाद देवी शुम्भ को पृथ्वी पर पटककर शूल से मारती हैं। - अध्याय ११ — देवताओं द्वारा नारायणी स्तुति व वरदान (५५ श्लोक, उत्तर चरित्र — महासरस्वती)
अग्नि आदि देवता कात्यायनी की 'नारायणी स्तुति' करते हैं ('सर्वमङ्गलमङ्गल्ये…')। देवी वर देती हैं और भविष्य के अवतार बताती हैं — नन्दा (यशोदा-गर्भ से), रक्तदन्तिका, शताक्षी, शाकम्भरी, दुर्गा (दुर्गमासुर-वध), भीमा, भ्रामरी — 'इत्थं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति…'। - अध्याय १२ — फलस्तुति (पाठ का माहात्म्य) (४१ श्लोक, उत्तर चरित्र — महासरस्वती)
देवी स्वयं पाठ का फल बताती हैं — अष्टमी, चतुर्दशी, नवमी को एकाग्र होकर यह माहात्म्य सुनने वाले का पाप, दरिद्रता, भय नष्ट होता है; शरद-ऋतु की वार्षिक महापूजा में इसका पाठ; 'सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वितः…'। - अध्याय १३ — सुरथ और वैश्य को वरदान (२९ श्लोक, उत्तर चरित्र — महासरस्वती)
मेधा ऋषि का उपदेश सुनकर सुरथ और समाधि नदी-तट पर तीन वर्ष तप करते हैं; देवी प्रकट होती हैं; सुरथ को राज्य और अगले जन्म में 'सावर्णि मनु' बनने का वर; समाधि वैश्य को मोक्ष देने वाला ज्ञान।
पाठ का क्रम
सप्तशती का पाठ सीधे अध्याय एक से नहीं होता। शास्त्रीय पाठ-विधि का क्रम:
- (वैकल्पिक, Advanced) शापोद्धार / उत्कीलन
- देवी कवच
- अर्गला स्तोत्र
- कीलक
- (गीताप्रेस क्रम) वेदोक्त/तन्त्रोक्त रात्रिसूक्त, देवी अथर्वशीर्ष
- नवार्ण मन्त्र जप — न्यास सहित; Advanced)
- सप्तशती अध्याय १–१३ (प्रत्येक चरित्र से पहले उसका ध्यान —
- नवार्ण मन्त्र जप (पुनः)
- ऋग्वेदोक्त देवीसूक्त
- (Advanced) प्राधानिक, वैकृतिक, मूर्ति रहस्य
- क्षमा प्रार्थना, देव्यपराधक्षमापन स्तोत्र
तीन चरित्र
- प्रथम चरित्र — महाकाली (अध्याय १)
- मध्यम चरित्र — महालक्ष्मी (अध्याय २–४)
- उत्तर चरित्र — महासरस्वती (अध्याय ५–१३)
सात दिन में सम्पूर्ण पाठ
- दिन १ — अध्याय १
- दिन २ — अध्याय २–३
- दिन ३ — अध्याय ४
- दिन ४ — अध्याय ५–८
- दिन ५ — अध्याय ९–१०
- दिन ६ — अध्याय ११
- दिन ७ — अध्याय १२–१३
पाठ के अङ्ग
पाठ से पूर्व देवी कवच, अर्गला स्तोत्र और कीलक स्तोत्र का पाठ विहित है। माँ दुर्गा के सभी पाठ · नवरात्रि