देवी कवचम्
माँ दुर्गा · Durga · स्तोत्र
देवी कवचम् के बोल
ॐ अस्य श्री देवीकवचस्य।
ब्रह्मा ऋषिः। अनुष्टुप् छन्दः।
श्री चण्डिका देवता। ॐ बीजम्।
ह्रीं शक्तिः। क्लीं कीलकम्।
दुर्गाप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः॥
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥
शिरो मे दुर्गा पातु ललाटे शूलधारिणी।
दृशौ भद्रकाली पातु श्रोत्रे महाशिरा तथा॥
घ्राणं पातु कौबेरी मुखं पातु महेश्वरी।
जिह्वां वाणी च पातु कण्ठं पातु अम्बिका॥
स्कन्धौ वाराही पातु बाहू मे वैष्णवी तथा।
हृदयं ललिता पातु उदरं शूलधारिणी॥
पादौ चण्डी च पातु सर्वाङ्गं मे सदाम्बिका।
सर्वतः पाहि मां नित्यं देवि दुर्गे नमोऽस्तु ते॥
— स्रोत: दुर्गासप्तशती — देवी कवचम्
देवी कवचम् — कब पढ़ें
आज मंगलवार है — माँ दुर्गा की आराधना का दिन। आज का जप विशेष फलदायी माना गया है।
जप की गिनती हेतु ऑनलाइन जप-माला का उपयोग करें — एक माला अर्थात 108 जप।
अगला संबंधित व्रत
माँ दुर्गा से जुड़ा अगला व्रत — मासिक दुर्गाष्टमी, गुरुवार, 20 अगस्त (2 दिन बाद)।
माँ दुर्गा मंत्र जप की विधि
जप सामान्यतः **108 बार** — एक माला — किया जाता है। संकल्प लेकर नित्य एक माला करना, अथवा विशेष कामना हेतु 11, 21 अथवा 108 दिन तक नियमित जप करने का विधान है।
ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटा पूर्व) जप हेतु श्रेष्ठ काल है; माँ दुर्गा की आराधना का वार मंगलवार है, अतः उस दिन का जप विशेष फलदायी माना जाता है।
माला: **रुद्राक्ष अथवा लाल चन्दन** की माला इस जप हेतु उपयुक्त कही गई है। माला की मणियाँ अंगूठे व मध्यमा से फेरी जाती हैं, तर्जनी का स्पर्श वर्जित है, और सुमेरु (मुख्य मनका) लाँघा नहीं जाता — वहाँ से माला उलटकर अगली आवृत्ति आरम्भ की जाती है।
जप के समय पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख रखें, आसन पर बैठें, और उच्चारण शुद्ध व स्थिर रखें। मन भटके तो गिनती नहीं, स्मरण महत्वपूर्ण है।