गौरीशाष्टकम् (चिन्तामणि)
भगवान शिव · Shiva · स्तोत्र
गौरीशाष्टकम् (चिन्तामणि) के बोल
भज गौरीशं भज गौरीशं गौरीशं भज मन्दमते।
जलभवदुस्तरजलधिसुतरणं ध्येयं चित्ते शिवहरचरणम्।
अन्योपायं न हि न हि सत्यं गेयं शङ्कर शङ्कर नित्यम्। भज गौरीशं भज गौरीशं गौरीशं भज मन्दमते॥
दारापत्यं क्षेत्रं वित्तं देहं गेहं सर्वमनित्यम्।
इति परिभावय सर्वमसारं गर्भविकृत्या स्वप्नविचारम्। भज गौरीशं भज गौरीशं गौरीशं भज मन्दमते॥
मलवैचित्ये पुनरावृत्तिः पुनरपि जननीजठरोत्पत्तिः।
पुनरप्याशाकुलितं जठरं किं न हि मुञ्चसि कथयेश्चित्तम्। भज गौरीशं भज गौरीशं गौरीशं भज मन्दमते॥
मायाकल्पितमैन्द्रं जालं न हि तत्सत्यं दृष्टिविकारम्।
ज्ञाते तत्त्वे सर्वमसारं मा कुरु मा कुरु विषयविचारम्। भज गौरीशं भज गौरीशं गौरीशं भज मन्दमते॥
रज्जौ सर्पभ्रमणारोपस्तद्वद्ब्रह्मणि जगदारोपः।
मिथ्यामायामोहविकारं मनसि विचारय बारम्बारम्। भज गौरीशं भज गौरीशं गौरीशं भज मन्दमते॥
अध्वरकोटीगङ्गागमनं कुरुते योगं चेन्द्रियदमनम्।
ज्ञानविहीनः सर्वमतेन न भवति मुक्तो जन्मशतेन। भज गौरीशं भज गौरीशं गौरीशं भज मन्दमते॥
सोऽहं हंसो ब्रह्मैवाहं शुद्धानन्दस्तत्त्वपरोऽहम्।
अद्वैतोऽहं सङ्गविहीने चेन्द्रिय आत्मनि निखिले लीने। भज गौरीशं भज गौरीशं गौरीशं भज मन्दमते॥
शङ्करकिङ्कर मा कुरु चिन्तां चिन्तामणिना विरचितमेतत्।
यः सद्भक्त्या पठति हि नित्यं
ब्रह्मणि लीनो भवति हि सत्यम्। भज गौरीशं भज गौरीशं गौरीशं भज मन्दमते॥
— स्रोत: गीताप्रेस, स्तोत्ररत्नावली, पृष्ठ 285-287
गौरीशाष्टकम् (चिन्तामणि) — कब पढ़ें
भगवान शिव की आराधना का दिन सोमवार है — अगला सोमवार, 19 अक्टूबर को।
जप की गिनती हेतु ऑनलाइन जप-माला का उपयोग करें — एक माला अर्थात 108 जप।
अगला संबंधित व्रत
भगवान शिव से जुड़ा अगला व्रत — शुक्ल प्रदोष, शुक्रवार, 23 अक्टूबर (6 दिन बाद)।
अन्य: मासिक शिवरात्रि — शनिवार, 7 नवंबर।
भगवान शिव मंत्र जप की विधि
जप सामान्यतः **108 बार** — एक माला — किया जाता है। संकल्प लेकर नित्य एक माला करना, अथवा विशेष कामना हेतु 11, 21 अथवा 108 दिन तक नियमित जप करने का विधान है।
ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटा पूर्व) जप हेतु श्रेष्ठ काल है; भगवान शिव की आराधना का वार सोमवार है, अतः उस दिन का जप विशेष फलदायी माना जाता है।
माला: **रुद्राक्ष** की माला इस जप हेतु उपयुक्त कही गई है। माला की मणियाँ अंगूठे व मध्यमा से फेरी जाती हैं, तर्जनी का स्पर्श वर्जित है, और सुमेरु (मुख्य मनका) लाँघा नहीं जाता — वहाँ से माला उलटकर अगली आवृत्ति आरम्भ की जाती है।
जप के समय पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख रखें, आसन पर बैठें, और उच्चारण शुद्ध व स्थिर रखें। मन भटके तो गिनती नहीं, स्मरण महत्वपूर्ण है।