कालिकाष्टकम् (शंकराचार्य)
माँ काली · Kali · स्तोत्र
कालिकाष्टकम् (शंकराचार्य) के बोल
॥ ध्यानम् ॥
गलद्रक्तमुण्डावलीकण्ठमाला महोघोररावा सुदंष्ट्रा कराला।
विवस्त्रा श्मशानालया मुक्तकेशी महाकालकामाकुला कालिकेयम्॥
॥ अष्टकम् ॥
क्रव्यादा विघ्नराजस्य शिरच्छेदनकारिणि।
कृष्णे कृष्णाभ्रसंकाशे कालिके कलिनाशिनि॥
जगन्मोहनीयं तु वाग्वादिनीयं सुहृत्पोषिणीशत्रुसंहारणीयम्।
वचस्तम्भनीयं किमुच्चाटनीयं स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः॥
इयं स्वर्गदात्री पुनः कल्पवल्ली मनोजास्तु कामान् यथार्थं प्रकुर्यात्।
तथा ते कृतार्था भवन्तीति नित्यं स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः॥
प्रचण्डप्रवाहा प्रकृष्टप्रभावा महामत्तमातङ्गमदमर्दिताङ्गी।
महासिद्धसङ्घाभिवन्द्यात्मरूपा स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः॥
कदाचिन्न नारी कदाचिद् धनेन कदाचित् सुतेनापि शोभिष्यते तत्।
न कालोपलब्धं न वेदोपगीतं स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः॥
महामेघकाली सुरक्ताऽपि शुभ्रा कदाचित् विचित्राकृतिर्योगमाया।
न बाला न वृद्धा न कामातुराऽपि स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः॥
यदा सा विमुक्ता जगत्कारिणी त्वं प्रकाशात्मिका सर्वदा स्वात्मरूपा।
स्वकीयेन रूपेण या संस्थिता हि स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः॥
क्षमस्वापराधं महागुप्तभावं मया लोकमध्ये प्रकाशीकृतं यत्।
तव ध्यानपूतेन चापल्यभावात् स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः॥
यदि ध्यानयुक्तं पठेत् यो मनुष्यस् तदा सर्वलोके विशालो भवेच्च।
गृहे चाष्टसिद्धिर्मृते चापि मुक्तिः स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः॥
इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं श्रीकालिकाष्टकं सम्पूर्णम्॥
— स्रोत: आदि शंकराचार्य कृत — कालिकाष्टकम् (संस्कृत दस्तावेज़, कालिरहस्य परम्परा)
कालिकाष्टकम् (शंकराचार्य) — कब पढ़ें
माँ काली की आराधना का दिन शनिवार है — अगला शनिवार, 22 अगस्त को।
जप की गिनती हेतु ऑनलाइन जप-माला का उपयोग करें — एक माला अर्थात 108 जप।
अगला संबंधित व्रत
माँ काली से जुड़ा अगला व्रत — मासिक दुर्गाष्टमी, गुरुवार, 20 अगस्त (2 दिन बाद)।
माँ काली मंत्र जप की विधि
जप सामान्यतः **108 बार** — एक माला — किया जाता है। संकल्प लेकर नित्य एक माला करना, अथवा विशेष कामना हेतु 11, 21 अथवा 108 दिन तक नियमित जप करने का विधान है।
ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटा पूर्व) जप हेतु श्रेष्ठ काल है; माँ काली की आराधना का वार शनिवार है, अतः उस दिन का जप विशेष फलदायी माना जाता है।
माला: **रुद्राक्ष अथवा लाल चन्दन** की माला इस जप हेतु उपयुक्त कही गई है। माला की मणियाँ अंगूठे व मध्यमा से फेरी जाती हैं, तर्जनी का स्पर्श वर्जित है, और सुमेरु (मुख्य मनका) लाँघा नहीं जाता — वहाँ से माला उलटकर अगली आवृत्ति आरम्भ की जाती है।
जप के समय पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख रखें, आसन पर बैठें, और उच्चारण शुद्ध व स्थिर रखें। मन भटके तो गिनती नहीं, स्मरण महत्वपूर्ण है।