श्रीसीतारामाष्टकम् (अच्युतयति)
भगवान राम · Ram · स्तोत्र
श्रीसीतारामाष्टकम् (अच्युतयति) के बोल
ब्रह्ममहेन्द्रसुरेन्द्रमरुद्गणरुद्रमुनीन्द्रगणैरतिरम्यं
क्षीरसरित्पतितीरमुपेत्य नुतं हि सतामवितारमुदारम्।
भूमिभरप्रशमार्थमथ प्रथितप्रकटीकृतचिद्घनमूर्तिं
त्वां भजतो रघुनन्दन देहि दयाघन मे स्वपदाम्बुजदास्यम्॥
पद्मदलायतलोचन हे रघुवंशविभूषण देव दयालो
निर्मलनीरदनीलतनोऽखिललोकहृदम्बुजभासक भानो।
कोमलगात्र पवित्रपदाब्जरजःकणपावितगौतमकान्त। त्वां भजतो रघुनन्दन देहि दयाघन मे स्वपदाम्बुजदास्यम्॥
पूर्ण परात्पर पालय मामतिदीनमनाथमनन्तसुखाब्धे
प्रावृडदभ्रतडित्सुमनोहरपीतवराम्बर राम नमस्ते।
कामविभञ्जन कान्ततरानन काञ्चनभूषण रत्नकिरीट। त्वां भजतो रघुनन्दन देहि दयाघन मे स्वपदाम्बुजदास्यम्॥
दिव्यशरच्छशिकान्तिहरोज्ज्वलमौक्तिकमालविशालसुमौले
कोटिरविप्रभ चारुचरित्रपवित्र विचित्रधनुःशरपाणे।
चण्डमहाभुजदण्डविखण्डितराक्षसराजमहागजदण्डं। त्वां भजतो रघुनन्दन देहि दयाघन मे स्वपदाम्बुजदास्यम्॥
दोषविहिंस्रभुजङ्गसहस्रसुरोषमहानलकीलकलापे
जन्मजरामरणोर्मिमये मदमन्मथनक्रविचक्रभवाब्धौ।
दुःखनिधौ च चिरं पतितं कृपयाद्य समुद्धर राम ततो मां। त्वां भजतो रघुनन्दन देहि दयाघन मे स्वपदाम्बुजदास्यम्॥
संसृतिघोरमदोत्कटकुञ्जरतृट्क्षुदनीरदपिण्डिततुण्डं
दण्डकरोन्मथितं च रजस्तम उन्मदमोहपदोज्झितमार्तम्।
दीनमनन्यगतिं कृपणं शरणागतमाशु विमोचय मूढं। त्वां भजतो रघुनन्दन देहि दयाघन मे स्वपदाम्बुजदास्यम्॥
जन्मशतार्जितपापसमन्वितहृत्कमले पतिते पशुकल्पे
हे रघुवीर महारणधीर दयां कुरु मय्यतिमन्दमनीषे।
त्वं जननी भगिनी च पिता मम तावदसि त्ववितापि कृपालो। त्वां भजतो रघुनन्दन देहि दयाघन मे स्वपदाम्बुजदास्यम्॥
त्वां तु दयालुमकिञ्चनवत्सलमुत्पलहारमपारमुदारं
राम विहाय कमन्यमनामयमीश जनं शरणं ननु यायाम्।
त्वत्पदपद्ममतः श्रितमेव मुदा खलु देव सदाव ससीत। त्वां तु दयालुमकिञ्चनवत्सलमुत्पलहारमपारमुदारं॥
यः करुणामृतसिन्धुरनाथजनोत्तमबन्धुरजोत्तमकारी
भक्तभयोर्मिभवाब्धितरिः सरयूतटिनीतटचारुविहारी।
तस्य रघुप्रवरस्य निरन्तरमष्टकमेतदनिष्टहरं वै
यस्तु पठेदमरः स नरो लभतेऽच्युतरामपदाम्बुजदास्यम्॥
— स्रोत: गीताप्रेस, स्तोत्ररत्नावली, पृष्ठ 157-159
अगला संबंधित व्रत
भगवान राम से जुड़ा अगला व्रत — शुक्ल पक्ष एकादशी, गुरुवार, 22 अक्टूबर (5 दिन बाद)।
भगवान राम मंत्र जप की विधि
जप सामान्यतः **108 बार** — एक माला — किया जाता है। संकल्प लेकर नित्य एक माला करना, अथवा विशेष कामना हेतु 11, 21 अथवा 108 दिन तक नियमित जप करने का विधान है।
ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटा पूर्व) जप हेतु श्रेष्ठ काल है।
माला: **तुलसी** की माला इस जप हेतु उपयुक्त कही गई है। माला की मणियाँ अंगूठे व मध्यमा से फेरी जाती हैं, तर्जनी का स्पर्श वर्जित है, और सुमेरु (मुख्य मनका) लाँघा नहीं जाता — वहाँ से माला उलटकर अगली आवृत्ति आरम्भ की जाती है।
जप के समय पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख रखें, आसन पर बैठें, और उच्चारण शुद्ध व स्थिर रखें। मन भटके तो गिनती नहीं, स्मरण महत्वपूर्ण है।