नवंबर का दूसरा प्रदोष: रवि प्रदोष व्रत, रविवार 22 नवंबर 2026

नवंबर 2026 का दूसरा प्रदोष व्रत रविवार, 22 नवंबर को है, इसलिए यह रवि प्रदोष कहलाएगा। भगवान शिव की प्रदोष पूजा का समय नई दिल्ली में शाम 17:25 से 20:06 तक है। महीने का पहला प्रदोष शुक्रवार, 6 नवंबर को धनतेरस के दिन शुक्र प्रदोष के रूप में पड़ा था।

एक नज़र में

व्रतरवि प्रदोष — रविवार, 22 नवंबर 2026
त्रयोदशी तिथि22 नवंबर 04:57 से 23 नवंबर 02:37 तक
प्रदोष काल (पूजा)17:25–20:06 (नई दिल्ली)
पक्ष-मासकार्तिक शुक्ल पक्ष
राहुकाल16:05–17:25 (पूजा इसके बाद, सूर्यास्त से)
चन्द्रमाअश्विनी नक्षत्र, मेष राशि

नवंबर 2026 के दोनों प्रदोष — एक नज़र में

प्रदोष व्रत हर महीने दो बार आता है — कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को, जब त्रयोदशी तिथि सूर्यास्त के बाद के प्रदोष काल में रहती है। व्रत का नाम उस दिन के वार से पड़ता है: सोमवार को सोम प्रदोष, शुक्रवार को शुक्र प्रदोष, रविवार को रवि प्रदोष।

क्रमदिनत्रयोदशीप्रदोष काल (नई दिल्ली)
पहला — शुक्र प्रदोष (कृष्ण पक्ष)शुक्रवार, 6 नवंबर6 नवंबर 10:31 से 7 नवंबर 10:4817:32–20:09
दूसरा — रवि प्रदोष (शुक्ल पक्ष)रविवार, 22 नवंबर22 नवंबर 04:57 से 23 नवंबर 02:3717:25–20:06

प्रदोष काल = सूर्यास्त से लगभग 2 घंटे 24 मिनट। दूसरे नगरों में सूर्यास्त के अनुसार समय थोड़ा आगे-पीछे होगा।

6 नवंबर का शुक्र प्रदोष धनतेरस के साथ पड़ा था, इसलिए बहुत से भक्त उस दिन उत्सव की भीड़ में प्रदोष पूजा ठीक से नहीं कर पाए होंगे। 22 नवंबर का रवि प्रदोष एक शान्त अवसर है — न कोई बड़ा उत्सव, न भागदौड़। जो भक्त प्रदोष व्रत आरम्भ करना चाहते हैं, उनके लिए यह अच्छा दिन है।

रवि प्रदोष का महत्त्व — आरोग्य, आयु और सूर्य देव

प्रदोष काल वह संध्या-बेला है जब दिन और रात मिलते हैं। प्रदोष-व्रत की पौराणिक परम्परा में माना जाता है कि इस समय भगवान शिव कैलास पर आनन्द-ताण्डव करते हैं और सभी देवता उनकी स्तुति करते हैं। इसलिए इस समय की गई शिव-पूजा का फल विशेष बताया गया है।

रविवार सूर्य देव का वार है, और ज्योतिष में सूर्य को आत्मा, आरोग्य, तेज और पिता का कारक माना जाता है। लोक-परम्परा में रवि प्रदोष को उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घ आयु और यश की कामना से जोड़ा जाता है — यानी भगवान शिव की कृपा और सूर्य देव के तेज का सुन्दर संयोग। भगवान शिव स्वयं ‘त्र्यम्बक’ हैं, जिनके एक नेत्र में सूर्य माने जाते हैं; इस दृष्टि से रविवार और प्रदोष का मेल स्वाभाविक लगता है।

कार्तिक मास का प्रदोष — दीपदान न भूलें

22 नवंबर का प्रदोष कार्तिक शुक्ल पक्ष में है। कार्तिक मास को दीपदान का सबसे पवित्र महीना माना जाता है, और इसी के दो दिन बाद मंगलवार, 24 नवंबर को कार्तिक पूर्णिमा / देव दीपावली है। इसलिए इस प्रदोष पर शिवलिंग के पास, तुलसी माता के पास और घर के मुख्य द्वार पर घी या तिल के तेल का दीप अवश्य जलाएँ। दीप स्थिर स्थान पर रखें, पर्दों और बच्चों से दूर।

प्रदोष पूजा विधि — क्रम से

  1. सुबह: स्नान करके भगवान शिव का स्मरण करें और हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें। दिन भर फलाहार रखें या अपनी परम्परा अनुसार उपवास करें।
  2. सूर्य देव को अर्घ्य: रविवार होने से सुबह ताँबे के लोटे में जल, थोड़ा रोली और लाल फूल डालकर सूर्य देव को अर्घ्य देना इस दिन को और सार्थक बनाता है।
  3. सूर्यास्त से पहले दोबारा स्नान: प्रदोष पूजा से पहले फिर स्नान करें या कम से कम हाथ-पैर-मुख धोकर स्वच्छ वस्त्र पहनें। ध्यान रखें, 16:05–17:25 राहुकाल है; पूजा सूर्यास्त 17:25 के बाद प्रदोष काल में आरम्भ करें।
  4. पूजा स्थान: उत्तर-पूर्व या पूर्व की ओर मुख करके बैठें। शिवलिंग न हो तो भगवान शिव, माता पार्वती और श्री गणेश जी का चित्र रखें। पहले श्री गणेश जी का स्मरण करें।
  5. अभिषेक: शिवलिंग पर क्रम से जल, दूध, दही, शहद, घी (पंचामृत) और फिर शुद्ध जल चढ़ाएँ। अभिषेक के समय ‘ॐ नमः शिवाय’ जपते रहें।
  6. अर्पण: बेलपत्र (तीन पत्तियों वाला, बिना कटा-फटा, चिकनी ओर शिवलिंग की तरफ़), धतूरा, आक के फूल, सफ़ेद चन्दन, भस्म, अक्षत और सफ़ेद मिठाई अर्पित करें। माता पार्वती को लाल चुनरी या सुहाग-सामग्री चढ़ाई जा सकती है।
  7. कथा और स्तुति: प्रदोष व्रत कथा पढ़ें या सुनें, शिव चालीसा अथवा प्रदोष स्तोत्र का पाठ करें।
  8. आरती: ‘जय शिव ओंकारा’ आरती करें, फिर परिक्रमा करें — शिवलिंग की आधी परिक्रमा की परम्परा है; जलाधारी (जल निकलने का मार्ग) को लाँघें नहीं।
  9. भोजन: पूजा के बाद प्रसाद लेकर एक समय सात्विक भोजन करें। त्रयोदशी अगली रात तक है, इसलिए व्रत उसी रात पूजा के बाद खोलना परम्परा में मान्य है।

प्रदोष के मंत्र

प्रदोष पूजा में सबसे सरल और सबसे प्रचलित मंत्र पंचाक्षर ‘नमः शिवाय’ है, जिसके आरम्भ में प्रणव ‘ॐ’ जोड़कर जप किया जाता है। इसे रुद्राक्ष की माला से 108 बार जपें।

ॐ नमः शिवाय

ॐ — मैं भगवान शिव को नमन करता हूँ। (‘नमः शिवाय’ पंचाक्षर मंत्र है; ‘ॐ’ सहित इसे षडक्षर कहा जाता है।)

— यजुर्वेद, श्री रुद्र (नमक) — ‘नमः शिवाय च शिवतराय च’

रवि प्रदोष की आरोग्य-भावना से महामृत्युंजय मंत्र का जप भी बहुत से भक्त करते हैं। इसे शुद्ध उच्चारण से, धीरे-धीरे जपें; उच्चारण कठिन लगे तो ‘ॐ नमः शिवाय’ ही पर्याप्त है।

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् ॥

हम तीन नेत्रों वाले भगवान शिव की उपासना करते हैं, जो सुगन्धमय हैं और जीवन को पुष्ट करते हैं। जैसे पका हुआ फल अपनी बेल से सहज छूट जाता है, वैसे ही वे हमें मृत्यु के बन्धन से मुक्त करें, अमरत्व से नहीं।

— ऋग्वेद 7.59.12 (महामृत्युंजय मंत्र)

प्रदोष की शाम 108 बार ‘ॐ नमः शिवाय’ — गिनती हमारी जप माला पर छोड़ दीजिए, आप ध्यान भगवान शिव पर रखिए। जप शुरू करें

क्या खाएँ, क्या न खाएँ

  • दिन में: फल, दूध, दही, मखाना, साबूदाना, सिंघाड़ा या कुट्टू से बना फलाहार, सेंधा नमक।
  • पूजा के बाद: एक समय सात्विक भोजन। कई परिवारों में रवि प्रदोष पर नमक न खाने या केवल मीठा भोजन लेने की परम्परा भी है — अपने परिवार की रीति मानें।
  • न लें: प्याज़, लहसुन, मांसाहार, मदिरा और तामसिक भोजन।
  • जल: निर्जल व्रत केवल स्वस्थ व्यक्ति, अपनी क्षमता देखकर ही रखें।

आम भूलें जिनसे बचें

  • दिन में पूजा करके निश्चिन्त हो जाना — प्रदोष व्रत की मुख्य पूजा सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में ही होती है।
  • राहुकाल में पूजा आरम्भ करना — 22 नवंबर को सूर्यास्त तक राहुकाल है; पूजा 17:25 के बाद शुरू करें।
  • शिवलिंग पर तुलसी या केतकी चढ़ाना — परम्परा में भगवान शिव को ये अर्पित नहीं किए जाते।
  • शिवलिंग पर हल्दी या सिन्दूर — इसकी जगह चन्दन और भस्म चढ़ाएँ।
  • कटे-फटे बेलपत्र — साफ़, पूरे तीन पत्तों वाला बेलपत्र ही चढ़ाएँ।
  • क्रोध और कटु वचन — व्रत का मूल संयम है; भोजन छोड़ना उसका केवल एक अंग है।

प्रदोष व्रत कितने करें, कैसे आरम्भ करें

परम्परा में 11 या 26 प्रदोष व्रत का संकल्प लेकर अन्त में उद्यापन करने की रीति है। पर संख्या से बड़ा नियम निरन्तरता है। चाहें तो इसी रवि प्रदोष से आरम्भ करें — हर प्रदोष की शाम केवल 20–30 मिनट: अभिषेक, बेलपत्र, 108 जप और आरती। प्रदोष की आगे की तिथियाँ हमारे प्रदोष पृष्ठ पर हर महीने अपडेट रहती हैं।

आगे आने वाले सभी प्रदोष व्रत, उनकी त्रयोदशी और प्रदोष काल एक साथ देखें। प्रदोष तिथियाँ

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नवंबर 2026 में प्रदोष व्रत कब-कब है?

नवंबर 2026 में दो प्रदोष हैं — शुक्रवार 6 नवंबर (शुक्र प्रदोष, धनतेरस के दिन) और रविवार 22 नवंबर (रवि प्रदोष)। महीने का दूसरा प्रदोष 22 नवंबर को है।

22 नवंबर 2026 को प्रदोष पूजा का समय क्या है?

नई दिल्ली में प्रदोष काल 17:25 से 20:06 तक है। त्रयोदशी 22 नवंबर 04:57 से 23 नवंबर 02:37 तक रहेगी, इसलिए पूरा प्रदोष काल त्रयोदशी में है।

रवि प्रदोष व्रत क्यों रखा जाता है?

रविवार सूर्य देव का वार है, इसलिए परम्परा में रवि प्रदोष को उत्तम स्वास्थ्य, आयु और यश की कामना से भगवान शिव की उपासना से जोड़ा जाता है। इस दिन सुबह सूर्य देव को अर्घ्य और संध्या में शिव-पूजा का विधान है।

प्रदोष व्रत में क्या खाना चाहिए?

दिन में फलाहार — फल, दूध, साबूदाना, सिंघाड़ा या कुट्टू — और संध्या पूजा के बाद एक समय सात्विक भोजन। प्याज़, लहसुन और तामसिक भोजन से बचें।

क्या प्रदोष व्रत दिन में पूजा करके खोल सकते हैं?

प्रदोष व्रत की मुख्य पूजा सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में होती है। इसलिए व्रत संध्या पूजा के बाद ही खोलें। दिन में सुबह की पूजा अतिरिक्त है, मुख्य पूजा का स्थान नहीं लेती।

क्या महिलाएँ प्रदोष व्रत रख सकती हैं?

हाँ, प्रदोष व्रत स्त्री-पुरुष सभी रख सकते हैं। स्वास्थ्य और परिस्थिति के अनुसार फलाहार या एक समय भोजन वाला व्रत भी पूर्ण माना जाता है।

2026 में रवि प्रदोष व्रत कब-कब हैं?

2026 में रविवार को पड़ने वाले प्रदोष व्रत: 1 मार्च, 12 जुलाई, 26 जुलाई, 22 नवंबर और 6 दिसंबर। वर्ष का अगला रवि प्रदोष 6 दिसंबर 2026 (कृष्ण पक्ष) है।

संदर्भ

स्कन्द पुराण (प्रदोष व्रत माहात्म्य) · शिव पुराण · ऋग्वेद 7.59.12 (महामृत्युंजय मंत्र) · यजुर्वेद — श्री रुद्र (पंचाक्षर) · निर्णयसिन्धु (प्रदोष-निर्णय) · आरती संग्रह पंचांग-गणना (नई दिल्ली)

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