श्री शनिदेव मन्त्र-संग्रह (मूल + बीज + ध्यान-प्रणाम + गायत्री ×4 + वैदिक + दश-नाम)

शनि देव · Shani · मंत्र

श्री शनिदेव मन्त्र-संग्रह (मूल + बीज + ध्यान-प्रणाम + गायत्री ×4 + वैदिक + दश-नाम) — शनि देव

श्री शनिदेव मन्त्र-संग्रह (मूल + बीज + ध्यान-प्रणाम + गायत्री ×4 + वैदिक + दश-नाम) के बोल

॥ श्री शनिदेव मन्त्र-संग्रह ॥

【 मूल मन्त्र 】
ॐ शं शनैश्चराय नमः॥

【 बीज / तान्त्रिक मन्त्र 】
ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः॥

【 ध्यान-प्रणाम मन्त्र 】
नीलाञ्जन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।
छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्॥

अर्थ: नीले अंजन के समान आभा वाले, सूर्य-पुत्र, यम के बड़े भाई,
छाया व मार्तण्ड (सूर्य) से उत्पन्न — उन शनैश्चर को मैं नमस्कार करता हूँ।

【 शनि गायत्री मन्त्र — चार प्रचलित पाठ 】
ॐ सूर्यात्मजाय विद्महे, मृत्युरूपाय धीमहि। तन्नः सौरिः प्रचोदयात्॥
ॐ भगभवाय विद्महे, मृत्युरूपाय धीमहि। तन्नो शनिः प्रचोदयात्॥
ॐ काकध्वजाय विद्महे, खड्गहस्ताय धीमहि। तन्नो मन्दः प्रचोदयात्॥
ॐ कालनेमि नन्दनाय विद्महे, महाकायाय धीमहि। तन्नो मन्दः प्रचोदयात्॥

【 शनि वैदिक मन्त्र 】
ॐ शन्नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये।
शंयोरभिस्रवन्तु नः॥

【 शनि दश-नाम (पिप्पलाद) 】
कोणस्थः पिंगलो बभ्रुः कृष्णो रौद्रोऽन्तको यमः।
सौरिः शनैश्चरो मन्दः पिप्पलादेन संस्तुतः॥

श्री शनिदेव मन्त्र-संग्रह (मूल + बीज + ध्यान-प्रणाम + गायत्री ×4 + वैदिक + दश-नाम) — कब पढ़ें

शनि देव की आराधना का दिन शनिवार है — अगला शनिवार, 22 अगस्त को।

जप की गिनती हेतु ऑनलाइन जप-माला का उपयोग करें — एक माला अर्थात 108 जप।

शनि की वर्तमान स्थिति

शनि इस समय मीन राशि में (वक्री) हैं, और 3 जून 2027 को मेष राशि में प्रवेश करेंगे।

इस समय मेष, मीन, कुम्भ राशि पर साढ़ेसाती तथा धनु, सिंह राशि पर ढैया चल रही है।

ग्रह की स्थिति निरयन (लाहिरी) खगोलीय गणना से — यह प्रतिदिन बदलती है।

शनि देव मंत्र जप की विधि

जप सामान्यतः **108 बार** — एक माला — किया जाता है। संकल्प लेकर नित्य एक माला करना, अथवा विशेष कामना हेतु 11, 21 अथवा 108 दिन तक नियमित जप करने का विधान है।

ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटा पूर्व) जप हेतु श्रेष्ठ काल है; शनि देव की आराधना का वार शनिवार है, अतः उस दिन का जप विशेष फलदायी माना जाता है।

माला: **रुद्राक्ष अथवा काले ऊन की** की माला इस जप हेतु उपयुक्त कही गई है। माला की मणियाँ अंगूठे व मध्यमा से फेरी जाती हैं, तर्जनी का स्पर्श वर्जित है, और सुमेरु (मुख्य मनका) लाँघा नहीं जाता — वहाँ से माला उलटकर अगली आवृत्ति आरम्भ की जाती है।

जप के समय पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख रखें, आसन पर बैठें, और उच्चारण शुद्ध व स्थिर रखें। मन भटके तो गिनती नहीं, स्मरण महत्वपूर्ण है।

शनि देव के अन्य पाठ