दशरथकृत शनि स्तुति

शनि देव · Shani · स्तोत्र

दशरथकृत शनि स्तुति — शनि देव

दशरथकृत शनि स्तुति के बोल

नमः कृष्णाय नीलाय शिखिकण्ठनिभाय च।
नमः कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नमः॥

नमो निर्मांसदेहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च।
नमो विशालनेत्राय शुष्कोदरभयाकृते॥

नमः पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णे च वै नमः।
नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्रनमोऽस्तु ते॥

नमस्ते कोणवासाय पिंगलाय नमोऽस्तु ते।
नमस्ते बभ्रुरूपाय कृष्णाय च नमो नमः॥

नमस्ते शुष्करूपाय महाद्रुमनिभाय च।
नमो हि सर्वभक्षाय बलिनां बलिने नमः॥

सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करस्याभयप्रद।
अधो दृष्टे नमस्तेऽस्तु संवर्ताय नमो नमः॥

एतैः स्तुतो महासौरिः शनैश्चरः।
ये सततं स्तुवन्ति विगतोद्वेगाः॥

— स्रोत: स्कन्दपुराण — दशरथकृत शनि स्तुति

दशरथकृत शनि स्तुति — कब पढ़ें

शनि देव की आराधना का दिन शनिवार है — अगला शनिवार, 22 अगस्त को।

जप की गिनती हेतु ऑनलाइन जप-माला का उपयोग करें — एक माला अर्थात 108 जप।

शनि की वर्तमान स्थिति

शनि इस समय मीन राशि में (वक्री) हैं, और 3 जून 2027 को मेष राशि में प्रवेश करेंगे।

इस समय मेष, मीन, कुम्भ राशि पर साढ़ेसाती तथा धनु, सिंह राशि पर ढैया चल रही है।

ग्रह की स्थिति निरयन (लाहिरी) खगोलीय गणना से — यह प्रतिदिन बदलती है।

शनि देव मंत्र जप की विधि

जप सामान्यतः **108 बार** — एक माला — किया जाता है। संकल्प लेकर नित्य एक माला करना, अथवा विशेष कामना हेतु 11, 21 अथवा 108 दिन तक नियमित जप करने का विधान है।

ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटा पूर्व) जप हेतु श्रेष्ठ काल है; शनि देव की आराधना का वार शनिवार है, अतः उस दिन का जप विशेष फलदायी माना जाता है।

माला: **रुद्राक्ष अथवा काले ऊन की** की माला इस जप हेतु उपयुक्त कही गई है। माला की मणियाँ अंगूठे व मध्यमा से फेरी जाती हैं, तर्जनी का स्पर्श वर्जित है, और सुमेरु (मुख्य मनका) लाँघा नहीं जाता — वहाँ से माला उलटकर अगली आवृत्ति आरम्भ की जाती है।

जप के समय पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख रखें, आसन पर बैठें, और उच्चारण शुद्ध व स्थिर रखें। मन भटके तो गिनती नहीं, स्मरण महत्वपूर्ण है।

शनि देव के अन्य पाठ