प्रातःस्मरणम् — श्रीसूर्यस्य

सूर्य देव · Surya · स्तोत्र

प्रातःस्मरणम् — श्रीसूर्यस्य — सूर्य देव

प्रातःस्मरणम् — श्रीसूर्यस्य के बोल

प्रातः स्मरामि खलु तत्सवितुर्वरेण्यं
रूपं हि मण्डलमृचोऽथ तनुर्यजूंषि।
सामानि यस्य किरणाः प्रभवादिहेतुं
ब्रह्माहरात्मकमलक्ष्यमचिन्त्यरूपम्॥
प्रातर्नमामि तरणिं तनुवाङ्मनोभि-
र्ब्रह्मेन्द्रपूर्वकसुरैर्नुतमर्चितं च।
वृष्टिप्रमोचनविनिग्रहहेतुभूतं
त्रैलोक्यपालनपरं त्रिगुणात्मकं च॥
प्रातर्भजामि सवितारमनन्तशक्तिं
पापौघशत्रुभयरोगहरं परं च।
तं सर्वलोककलनात्मककालमूर्तिं
गोकण्ठबन्धनविमोचनमादिदेवम्॥
श्लोकत्रयमिदं भानोः प्रातःकाले पठेत्तु यः।
स सर्वव्याधिनिर्मुक्तः परं सुखमवाप्नुयात्॥

— स्रोत: गीताप्रेस, स्तोत्ररत्नावली, पृष्ठ 263-264

प्रातःस्मरणम् — श्रीसूर्यस्य — कब पढ़ें

सूर्य देव की आराधना का दिन रविवार है — अगला रविवार, 18 अक्टूबर को।

जप की गिनती हेतु ऑनलाइन जप-माला का उपयोग करें — एक माला अर्थात 108 जप।

सूर्य की वर्तमान स्थिति

सूर्य इस समय कन्या राशि में हैं, और 18 अक्टू॰ 2026 को तुला राशि में प्रवेश करेंगे।

ग्रह की स्थिति निरयन (लाहिरी) खगोलीय गणना से — यह प्रतिदिन बदलती है।

सूर्य देव मंत्र जप की विधि

जप सामान्यतः **108 बार** — एक माला — किया जाता है। संकल्प लेकर नित्य एक माला करना, अथवा विशेष कामना हेतु 11, 21 अथवा 108 दिन तक नियमित जप करने का विधान है।

ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटा पूर्व) जप हेतु श्रेष्ठ काल है; सूर्य देव की आराधना का वार रविवार है, अतः उस दिन का जप विशेष फलदायी माना जाता है।

माला: **रुद्राक्ष अथवा लाल चन्दन** की माला इस जप हेतु उपयुक्त कही गई है। माला की मणियाँ अंगूठे व मध्यमा से फेरी जाती हैं, तर्जनी का स्पर्श वर्जित है, और सुमेरु (मुख्य मनका) लाँघा नहीं जाता — वहाँ से माला उलटकर अगली आवृत्ति आरम्भ की जाती है।

जप के समय पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख रखें, आसन पर बैठें, और उच्चारण शुद्ध व स्थिर रखें। मन भटके तो गिनती नहीं, स्मरण महत्वपूर्ण है।

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