श्रीसत्यनारायणाष्टकम्
भगवान विष्णु · Vishnu · स्तोत्र
श्रीसत्यनारायणाष्टकम् के बोल
आदिदेवं जगत्कारणं श्रीधरं लोकनाथं विभुं व्यापकं शङ्करम्।
सर्वभक्तेष्टदं मुक्तिदं माधवं सत्यनारायणं विष्णुमीशम्भजे॥
सर्वदा लोककल्याणपारायणं देवगोविप्ररक्षार्थसद्विग्रहम्।
दीनहीनात्मभक्ताश्रयं सुन्दरं सत्यनारायणं विष्णुमीशम्भजे॥
दक्षिणे यस्य गङ्गा शुभा शोभते राजते सा रमा यस्य वामे सदा।
यः प्रसन्नाननो भाति भव्यश्च तं सत्यनारायणं विष्णुमीशम्भजे॥
सङ्कटे सङ्गरे यं जनः सर्वदा स्वात्मभीनाशनाय स्मरेत् पीडितः।
पूर्णकृत्यो भवेद् यत्प्रसादाच्च तं सत्यनारायणं विष्णुमीशम्भजे॥
वाञ्छितं दुर्लभं यो ददाति प्रभुः साधवे स्वात्मभक्ताय भक्तिप्रियः।
सर्वभूताश्रयं तं हि विश्वम्भरं सत्यनारायणं विष्णुमीशम्भजे॥
ब्राह्मणः साधुवैश्यश्च तुङ्गध्वजो येऽभवन् विश्रुता यस्य भक्त्यामराः।
लीलया यस्य विश्वं ततं तं विभुं सत्यनारायणं विष्णुमीशम्भजे॥
येन चाब्रह्मबालतृणं धार्यते सृज्यते पाल्यते सर्वमेतज्जगत्।
भक्तभावप्रियं श्रीदयासागरं सत्यनारायणं विष्णुमीशम्भजे॥
सर्वकामप्रदं सर्वदा सत्प्रियं वन्दितं देववृन्दैर्मुनीन्द्रार्चितम्।
पुत्रपौत्रादिसर्वेष्टदं शाश्वतं सत्यनारायणं विष्णुमीशम्भजे॥
अष्टकं सत्यदेवस्य भक्त्या नरः भावयुक्तो मुदा यस्त्रिसन्ध्यं पठेत्।
तस्य नश्यन्ति पापानि तेनाग्निना इन्धनानीव शुष्काणि सर्वाणि वै॥
— स्रोत: गीताप्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश, पृष्ठ 303
श्रीसत्यनारायणाष्टकम् — कब पढ़ें
भगवान विष्णु की आराधना का दिन गुरुवार है — अगला गुरुवार, 22 अक्टूबर को।
जप की गिनती हेतु ऑनलाइन जप-माला का उपयोग करें — एक माला अर्थात 108 जप।
गुरु की वर्तमान स्थिति
गुरु इस समय कर्क राशि में हैं, और 1 नव॰ 2026 को सिंह राशि में प्रवेश करेंगे।
ग्रह की स्थिति निरयन (लाहिरी) खगोलीय गणना से — यह प्रतिदिन बदलती है।
अगला संबंधित व्रत
भगवान विष्णु से जुड़ा अगला व्रत — शुक्ल पक्ष एकादशी, गुरुवार, 22 अक्टूबर (5 दिन बाद)।
भगवान विष्णु मंत्र जप की विधि
जप सामान्यतः **108 बार** — एक माला — किया जाता है। संकल्प लेकर नित्य एक माला करना, अथवा विशेष कामना हेतु 11, 21 अथवा 108 दिन तक नियमित जप करने का विधान है।
ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटा पूर्व) जप हेतु श्रेष्ठ काल है; भगवान विष्णु की आराधना का वार गुरुवार है, अतः उस दिन का जप विशेष फलदायी माना जाता है।
माला: **तुलसी** की माला इस जप हेतु उपयुक्त कही गई है। माला की मणियाँ अंगूठे व मध्यमा से फेरी जाती हैं, तर्जनी का स्पर्श वर्जित है, और सुमेरु (मुख्य मनका) लाँघा नहीं जाता — वहाँ से माला उलटकर अगली आवृत्ति आरम्भ की जाती है।
जप के समय पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख रखें, आसन पर बैठें, और उच्चारण शुद्ध व स्थिर रखें। मन भटके तो गिनती नहीं, स्मरण महत्वपूर्ण है।