सूर्य कवचम् (ब्रह्मपुराण)

सूर्य देव · Surya · स्तोत्र

सूर्य कवचम् (ब्रह्मपुराण) — सूर्य देव

सूर्य कवचम् (ब्रह्मपुराण) के बोल

ॐ अस्य श्री सूर्यकवचस्तोत्रस्य।
याज्ञवल्क्य ऋषिः। अनुष्टुप् छन्दः।
श्री सूर्यो देवता। श्री सूर्यप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः॥

शिरो मे भास्करः पातु ललाटं मे दिवाकरः।
नेत्रे पातु सहस्रांशुः श्रोत्रे पातु दिनाधिपः॥

घ्राणं घर्मस्य तनयः पातु वक्त्रं तु भास्करः।
जिह्वां मे मित्रः पातु कण्ठं च रविनन्दनः॥

स्कन्धौ पातु रविः पातु भुजौ पातु विवस्वान् मे।
हृदयं पातु मार्तण्डः पातु मे जठरं ग्रहः॥

नाभिं सावित्र्यसम्भूतः पातु मे वायुमण्डलम्।
कटिं पातु सुरगुरुः पातु नाभिं च प्रभाकरः॥

ऊरू पातु त्वष्टा मे पातु जानू तु सप्तमः।
पादौ पातु हिरण्यगर्भः सर्वाङ्गं पातु भानुमान्॥

इत्येवं सूर्यस्य कवचं पठेत् यो नित्यमेव हि।
रोगी रोगात् प्रमुच्येत बद्धो मुच्येत बन्धनात्॥

— स्रोत: ब्रह्मपुराण — सूर्य कवच

सूर्य कवचम् (ब्रह्मपुराण) — कब पढ़ें

सूर्य देव की आराधना का दिन रविवार है — अगला रविवार, 23 अगस्त को।

जप की गिनती हेतु ऑनलाइन जप-माला का उपयोग करें — एक माला अर्थात 108 जप।

सूर्य की वर्तमान स्थिति

सूर्य इस समय सिंह राशि में हैं, और 17 सित॰ 2026 को कन्या राशि में प्रवेश करेंगे।

ग्रह की स्थिति निरयन (लाहिरी) खगोलीय गणना से — यह प्रतिदिन बदलती है।

सूर्य देव मंत्र जप की विधि

जप सामान्यतः **108 बार** — एक माला — किया जाता है। संकल्प लेकर नित्य एक माला करना, अथवा विशेष कामना हेतु 11, 21 अथवा 108 दिन तक नियमित जप करने का विधान है।

ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटा पूर्व) जप हेतु श्रेष्ठ काल है; सूर्य देव की आराधना का वार रविवार है, अतः उस दिन का जप विशेष फलदायी माना जाता है।

माला: **रुद्राक्ष अथवा लाल चन्दन** की माला इस जप हेतु उपयुक्त कही गई है। माला की मणियाँ अंगूठे व मध्यमा से फेरी जाती हैं, तर्जनी का स्पर्श वर्जित है, और सुमेरु (मुख्य मनका) लाँघा नहीं जाता — वहाँ से माला उलटकर अगली आवृत्ति आरम्भ की जाती है।

जप के समय पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख रखें, आसन पर बैठें, और उच्चारण शुद्ध व स्थिर रखें। मन भटके तो गिनती नहीं, स्मरण महत्वपूर्ण है।

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