छठ पूजा 2026: चारों दिन की तिथि, अर्घ्य का समय और पूरी विधि
छठ महापर्व 2026 शुक्रवार 13 नवंबर को नहाय-खाय से आरम्भ होगा, शनिवार 14 नवंबर को खरना, रविवार 15 नवंबर को मुख्य दिन षष्ठी पर डूबते सूर्य देव को संध्या अर्घ्य और सोमवार 16 नवंबर को उगते सूर्य देव को उषा अर्घ्य देकर पारण होगा। नई दिल्ली में 15 नवंबर का सूर्यास्त 17:27 और 16 नवंबर का सूर्योदय 06:44 है; अपने नगर का समय नीचे की तालिका में देखें।
एक नज़र में
| नहाय-खाय | शुक्रवार, 13 नवंबर 2026 |
|---|---|
| खरना (लोहंडा) | शनिवार, 14 नवंबर 2026 |
| संध्या अर्घ्य (मुख्य दिन) | रविवार, 15 नवंबर — दिल्ली सूर्यास्त 17:27 |
| उषा अर्घ्य व पारण | सोमवार, 16 नवंबर — दिल्ली सूर्योदय 06:44 |
| षष्ठी तिथि | 14 नवंबर 23:24 से 16 नवंबर 02:01 तक |
| आराध्य | सूर्य देव और छठी मैया |
छठ 2026 एक नज़र में: चार दिन, एक संकल्प
छठ ऐसा व्रत है जिसमें न पुरोहित की अनिवार्यता है, न मूर्ति की, न मन्दिर की। व्रती स्वयं जल में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं और छठी मैया से परिवार, संतान और आरोग्य की कामना करते हैं। बिहार, झारखंड और पूर्वांचल में यह सबसे बड़ा लोक-पर्व है; नेपाल के मधेश, विशेषकर जनकपुर के मैथिल समाज में भी इसकी गहरी जड़ें हैं। मॉरीशस, फ़िजी, सूरीनाम से खाड़ी देशों तक जहाँ भोजपुरी, मगही और मैथिली परिवार बसे, वहाँ घाट भी बस गए।
इस वर्ष कार्तिक शुक्ल षष्ठी 14 नवंबर रात 23:24 से आरम्भ होकर 16 नवंबर 02:01 तक रहेगी। इसलिए 15 नवंबर का पूरा दिन और उसकी संध्या षष्ठी में पड़ती है — यही मुख्य दिन है। एक सुखद संयोग यह भी है कि संध्या अर्घ्य रविवार को है, और रविवार परम्परा से सूर्य देव का वार माना जाता है।
दिन-प्रतिदिन: क्या होता है और क्यों
पहला दिन — नहाय-खाय (शुक्रवार, 13 नवंबर): व्रती प्रातः स्नान करके घर और रसोई की शुद्धि करते हैं। इस दिन एक बार सात्विक भोजन होता है — प्रायः अरवा चावल का भात, चने की दाल और लौकी (कद्दू) की सब्ज़ी, घी के साथ। इसी कारण कई जगह इसे ‘कद्दू-भात’ भी कहते हैं। प्याज़-लहसुन घर से हटा दिए जाते हैं। नहाय-खाय का अर्थ है — शरीर और घर दोनों को आने वाले कठिन व्रत के लिए तैयार करना।
दूसरा दिन — खरना या लोहंडा (शनिवार, 14 नवंबर): व्रती दिन भर निराहार रहते हैं। संध्या को स्नान के बाद मिट्टी के चूल्हे या शुद्ध चूल्हे पर गुड़ की खीर (रसियाव), घी लगी रोटी या पूड़ी और केला प्रसाद रूप में बनता है। एकान्त में पूजा के बाद व्रती यही प्रसाद ग्रहण करते हैं, फिर परिवार और पड़ोसी। इसी प्रसाद के बाद लगभग 36 घंटे का निर्जला व्रत आरम्भ होता है, जो उषा अर्घ्य के बाद पारण पर पूरा होता है। ठेकुआ बनाने की तैयारी भी प्रायः इसी दिन से शुरू होती है।
तीसरा दिन — संध्या अर्घ्य (रविवार, 15 नवंबर, षष्ठी): दिन में ठेकुआ, कसार और फलों से सूप-दउरा सजते हैं। दोपहर बाद परिवार बहँगी या सिर पर दउरा लेकर गीत गाते हुए घाट की ओर चलता है। व्रती जल में खड़े होकर पश्चिम की ओर मुख करके अस्ताचलगामी सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं। कई परिवार लौटकर आँगन या छत पर ‘कोसी भरना’ करते हैं — ईख के डंठलों के बीच मिट्टी के घड़े या कोसी में प्रसाद रखकर दीये जलाए जाते हैं; यह प्रायः किसी मनोकामना के पूरे होने पर किया जाता है।
चौथा दिन — उषा अर्घ्य व पारण (सोमवार, 16 नवंबर): भोर से पहले परिवार फिर घाट पहुँचता है। व्रती पूर्व की ओर मुख करके जल में खड़े होकर उदयीमान सूर्य देव की प्रतीक्षा करते हैं और उनके प्रकट होते ही अर्घ्य देते हैं। फिर क्षमा-प्रार्थना, प्रसाद वितरण और अदरक-गुड़ या शरबत से पारण होता है। 16 नवंबर के सूर्योदय तक षष्ठी (02:01 तक) बीत चुकी होगी — पर परम्परा में उषा अर्घ्य सदा षष्ठी के अगले भोर में ही होता है, इसलिए कोई दुविधा नहीं।
अर्घ्य का समय: 16 शहरों का सूर्यास्त और सूर्योदय
छठ का अर्घ्य किसी अलग ‘मुहूर्त’ से नहीं, स्वयं सूर्य देव के अस्त और उदय से बँधा है। इसलिए हर नगर का समय अलग होता है। नीचे की तालिका आरती संग्रह पंचांग-गणना से है।
| शहर | 15 नवंबर सूर्यास्त (संध्या अर्घ्य) | 16 नवंबर सूर्योदय (उषा अर्घ्य) |
|---|---|---|
| पटना | 17:00 | 06:07 |
| वाराणसी | 17:10 | 06:15 |
| कोलकाता | 16:52 | 05:49 |
| नई दिल्ली | 17:27 | 06:44 |
| मुंबई | 18:00 | 06:46 |
| लखनऊ | 17:15 | 06:26 |
| भोपाल | 17:35 | 06:34 |
| प्रयागराज | 17:14 | 06:20 |
| सूरत | 17:57 | 06:49 |
| पुणे | 17:56 | 06:41 |
| बेंगलुरु | 17:49 | 06:18 |
| हैदराबाद | 17:40 | 06:21 |
| चेन्नई | 17:39 | 06:08 |
| अहमदाबाद | 17:55 | 06:53 |
| जयपुर | 17:36 | 06:47 |
| इंदौर | 17:42 | 06:40 |
समय IST में। घाट पर सूर्यास्त से पहले पहुँचें और सूर्योदय से पहले जल में खड़े हो जाएँ।
पूजा सामग्री: सूप-दउरा में क्या रखें
- बाँस के सूप और दउरा (बड़ी टोकरी) — बाँस को शुद्धता और वंश-वृद्धि का प्रतीक माना जाता है; कहीं-कहीं पीतल का सूप भी चलता है
- ठेकुआ और कसार (चावल के आटे-गुड़ के लड्डू) — छठ का मुख्य प्रसाद
- केले का घौद, जटा वाला नारियल, ईख (गन्ना) के डंठल
- मौसमी फल-कन्द: शकरकंद, सुथनी, सिंघाड़ा, बड़ा नींबू (डाभ), मूली, कच्ची हल्दी और अदरक के पौधे
- मिट्टी के दीये, घी, बाती, अरवा चावल, सिंदूर, पान-सुपारी, लाल-पीला वस्त्र
- अर्घ्य के लिए लोटा, कच्चा दूध और शुद्ध जल
- कोसी के लिए मिट्टी का घड़ा या कोसी, ईख के डंठल और दीये (यदि मनौती हो)
छठ की लगभग हर वस्तु उसी मौसम की फ़सल है — नया गुड़, नई ईख, कन्द-मूल। इसीलिए इसे सूर्य देव के प्रति किसान का धन्यवाद-पर्व भी कहा जाता है।
व्रती के नियम: शुद्धता ही इस व्रत की आत्मा
- नहाय-खाय से पारण तक घर में प्याज़-लहसुन और मांसाहार नहीं; खरना से पारण तक व्रती नमक नहीं लेते
- प्रसाद अलग, शुद्ध रसोई या नए-शुद्ध चूल्हे पर बनता है; अर्घ्य से पहले प्रसाद चखा नहीं जाता
- व्रती प्रायः ज़मीन पर चटाई या कम्बल बिछाकर सोते हैं
- स्वच्छ, बिना सिले या नए वस्त्र — परम्परा में स्त्रियाँ प्रायः साड़ी और पुरुष धोती पहनते हैं
- वाणी और व्यवहार में संयम; कलह, निन्दा और क्रोध से दूरी
कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए
कच्चे बाँस की बहँगी (काँवर) है, जो प्रसाद के भार से लचकती हुई छठी मैया के घाट की ओर जा रही है। घाट की राह पर गाया जाने वाला यह सबसे प्रिय छठ गीत है।
— पारम्परिक छठ लोकगीत (भोजपुरी)
स्वास्थ्य और घाट पर सुरक्षा
- बच्चों को जल के पास अकेला न छोड़ें; गहरे पानी में व्रती के साथ एक सहायक रहे
- घाट पर बाँस-रस्सी से बनी सीमा के भीतर ही जल में उतरें; अनजान घाट पर गहराई पहले जाँच लें
- भीड़ में धक्का-मुक्की से बचें, बुज़ुर्गों को किनारे वाली जगह दें, बच्चों की जेब में घर का फ़ोन नम्बर रखें
- दीये और पटाखे साड़ी-धोती से दूर रखें; सिंथेटिक वस्त्र आग जल्दी पकड़ते हैं
- भोर का पानी ठंडा होता है — उषा अर्घ्य के बाद तुरन्त सूखे, गरम वस्त्र दें
- पूजा के बाद फूल-पत्ते और प्लास्टिक जल में न छोड़ें; नदी स्वयं इस पर्व की देवी-स्वरूप साक्षी है
घर से दूर हैं? छत या आँगन में घाट
महानगरों और विदेश में बसे बहुत से परिवार नदी तक नहीं पहुँच पाते। ऐसे में छत, आँगन या सोसाइटी के खुले स्थान पर ईंटों या टब से छोटा कृत्रिम जलाशय बनाकर स्वच्छ जल भरें, किनारे ईख और दीये सजाएँ और वहीं खड़े होकर अर्घ्य दें। छठ में जल और सूर्य देव का दर्शन मुख्य है, स्थान नहीं। छत की मुंडेर बच्चों और दीयों के लिए सुरक्षित हो।
छठ महापर्व की कथा, विधि और अपने नगर के अनुसार समय एक ही स्थान पर देखें। छठ पूजा देखें
पारण के बाद भी प्रतिदिन प्रातः सूर्य मंत्र का 108 बार जाप जाप माला पर शांत मन से करें। जाप माला खोलें
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
छठ पूजा 2026 कब है?
छठ 2026 में शुक्रवार 13 नवंबर को नहाय-खाय, शनिवार 14 नवंबर को खरना, रविवार 15 नवंबर को संध्या अर्घ्य और सोमवार 16 नवंबर को उषा अर्घ्य व पारण होगा। मुख्य दिन 15 नवंबर (षष्ठी) है।
15 नवंबर को संध्या अर्घ्य का समय क्या है?
अर्घ्य सूर्यास्त के समय दिया जाता है। नई दिल्ली में सूर्यास्त 17:27, पटना में 17:00, वाराणसी में 17:10 और कोलकाता में 16:52 पर है। अन्य नगरों का समय ऊपर तालिका में है।
16 नवंबर को उषा अर्घ्य कब दें?
उदय होते सूर्य देव को अर्घ्य दिया जाता है। नई दिल्ली में सूर्योदय 06:44, पटना में 06:07, लखनऊ में 06:26 और मुंबई में 06:46 पर है। घाट पर कुछ समय पहले पहुँचकर जल में खड़े हो जाएँ।
खरना के दिन क्या खाया जाता है?
खरना की संध्या को गुड़ की खीर (रसियाव), घी लगी रोटी या पूड़ी और केला प्रसाद बनता है, जिसमें नमक नहीं होता। व्रती पहले यह प्रसाद ग्रहण करते हैं, फिर परिवार। इसके बाद निर्जला व्रत आरम्भ होता है।
क्या गर्भवती महिला या बीमार व्यक्ति छठ का निर्जला व्रत रख सकते हैं?
36 घंटे का निर्जला व्रत शरीर पर भारी होता है। गर्भावस्था, बीमारी या नियमित दवा की स्थिति में पहले चिकित्सक से सलाह लें। परम्परा परिवार के किसी अन्य सदस्य द्वारा व्रत या फलाहार की छूट भी देती है।
संदर्भ
ब्रह्मवैवर्त पुराण (प्रकृति खण्ड — षष्ठी देवी आख्यान) · बिहार, पूर्वांचल और मिथिला की छठ लोक-परम्परा · आरती संग्रह पंचांग-गणना (नई दिल्ली)
और पढ़ें
- छठ पूजा — विधि, कथा और समय
- डूबते सूर्य देव को पहला अर्घ्य क्यों?
- ठेकुआ — छठ प्रसाद का महत्व और विधि
- श्री सूर्यदेव जी की आरती
- श्री सूर्य चालीसा
- छठ में डूबते सूर्य देव को पहला अर्घ्य क्यों दिया जाता है?
- ठेकुआ: छठ प्रसाद का हृदय — महत्व, नियम और पारम्परिक विधि
- दीपोत्सव 2026: रमा एकादशी से भाई दूज तक हर दिन की तिथि और समय
- धनतेरस 2026 और शुक्र प्रदोष एक ही दिन: संयुक्त पूजा विधि व मुहूर्त