छठ में डूबते सूर्य देव को पहला अर्घ्य क्यों दिया जाता है?
छठ में पहला अर्घ्य डूबते सूर्य देव को इसलिए दिया जाता है क्योंकि यह पर्व पूरे दिन के प्रकाश, फ़सल और जीवन के लिए कृतज्ञता है — और कृतज्ञता दिन के अन्त में व्यक्त की जाती है; अगले भोर का उषा अर्घ्य नए आरम्भ की प्रार्थना है। इस भाव में यह सीख भी छिपी है कि जो ढल रहा है, उसका भी उतना ही सम्मान हो जितना उगते का। 2026 में यह संध्या अर्घ्य रविवार 15 नवंबर को है; नई दिल्ली में सूर्यास्त 17:27 पर होगा।
एक नज़र में
| संध्या अर्घ्य | रविवार, 15 नवंबर 2026 (षष्ठी) |
|---|---|
| उषा अर्घ्य | सोमवार, 16 नवंबर 2026 |
| दिल्ली | सूर्यास्त 17:27 · सूर्योदय 06:44 |
| पटना | सूर्यास्त 17:00 · सूर्योदय 06:07 |
| मुख | संध्या में पश्चिम, भोर में पूर्व |
सीधा उत्तर: अन्त का सम्मान, फिर आरम्भ की प्रार्थना
संसार में प्रायः उगते सूरज को प्रणाम करने की बात कही जाती है। छठ इस कहावत को उलट देता है। यहाँ व्रती पहले उस सूर्य देव के सामने जल में खड़े होते हैं जो क्षितिज की ओर ढल रहे हैं, और अगली भोर उन्हीं के उदय की प्रतीक्षा करते हैं। यह क्रम संयोग नहीं है — इसमें जीवन का पूरा चक्र है: दिन भर जो मिला उसके लिए धन्यवाद, रात भर धैर्य, और भोर में नई शुरुआत की विनती।
इस क्रम का एक नैतिक अर्थ भी है, जिसे गाँव की बुज़ुर्ग व्रती बड़ी सहजता से कहती हैं — जो डूबता है, वही फिर उगता है। ढलते का साथ न छोड़ना, बुज़ुर्गों, थके हुए और कठिन समय से गुज़र रहे लोगों का सम्मान करना — छठ का संध्या अर्घ्य यही संस्कार सिखाता है।
शास्त्रीय जड़ें: वेद की उषा से संध्या-वंदन तक
सूर्य देव को अर्घ्य देना भारत की सबसे पुरानी उपासनाओं में से है। ऋग्वेद में उषा देवी के अनेक सूक्त हैं, जिनमें भोर के प्रकाश को जीवन जगाने वाली शक्ति के रूप में गाया गया है। द्विजों के नित्य संध्या-वंदन में भी प्रातः और सायं, दोनों संध्याओं में सूर्य देव को जल का अर्घ्य देने का विधान रहा है। अर्थात् दिन ढलते समय सूर्य देव की उपासना कोई नई बात नहीं; छठ ने इसी प्राचीन रीति को लोक-पर्व का विशाल रूप दे दिया।
छठी मैया का सम्बन्ध षष्ठी देवी से जोड़ा जाता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृति खण्ड में षष्ठी देवी को प्रकृति का अंश, देवसेना और शिशुओं की रक्षा करने वाली देवी कहा गया है; वहीं राजा प्रियव्रत की कथा आती है, जिनकी संतान को देवी की कृपा से जीवन मिला। जन्म के छठे दिन की छठी-पूजा की परम्परा भी इसी से जुड़ती है। इसीलिए छठ में सूर्य देव के साथ छठी मैया से संतान-मंगल की कामना की जाती है।
लोक-मान्यताएँ: उषा, प्रत्यूषा और घाट की कथाएँ
बिहार और पूर्वांचल की लोक-मान्यता में कहा जाता है कि संध्या अर्घ्य सूर्य देव की अन्तिम किरण प्रत्यूषा को और उषा अर्घ्य पहली किरण उषा को समर्पित है; इन्हें सूर्य देव की शक्तियाँ या पत्नियाँ कहा जाता है। यहाँ ईमानदारी से दो बातें जोड़नी ज़रूरी हैं। पहली — पुराणों में सूर्य देव की पत्नियों के रूप में प्रायः संज्ञा और छाया का नाम आता है; उषा-प्रत्यूषा वाली व्याख्या मुख्यतः लोक-परम्परा की है। दूसरी — संस्कृत में ‘प्रत्यूष’ शब्द स्वयं भोर के अर्थ में भी आता है, फिर भी छठ की लोक-परम्परा में प्रत्यूषा को संध्या की किरण माना गया है; कुछ लोग इस रूप को ‘संध्या’ नाम से भी पुकारते हैं। भक्ति के लिए भाव प्रमुख है, पर नामों को शास्त्र-वचन बताकर प्रस्तुत करना ठीक नहीं।
इसी तरह कई कथाएँ घाटों पर पीढ़ियों से सुनाई जाती हैं — कि वनवास से लौटकर माता सीता ने कार्तिक षष्ठी पर सूर्य देव की उपासना की (मुंगेर क्षेत्र में इससे जुड़ा स्थान बताया जाता है), कि सूर्य-पुत्र कर्ण प्रतिदिन जल में खड़े होकर अर्घ्य देते थे, और कि कठिन समय में द्रौपदी ने यह व्रत किया। इन्हें लोक-कथा के रूप में ही ग्रहण करें; इनका मूल्य इस बात में है कि वे बताती हैं कि यह व्रत लोगों के मन में कितना पुराना और गहरा है।
शाम और भोर का प्रकाश: एक विनम्र व्याख्या
कुछ लोग अर्घ्य के समय को विज्ञान से जोड़कर बड़े-बड़े दावे करते हैं। हम इतना ही कहेंगे जितना सहज रूप से दिखता है: सूर्यास्त और सूर्योदय के समय प्रकाश कोमल होता है, धूप की तीव्रता कम रहती है और जल पर पड़ती लालिमा आँखों को शान्त लगती है। कार्तिक की ठंडी हवा, बहता जल और सामूहिक गीत मन को स्थिर करते हैं। इससे अधिक कोई स्वास्थ्य-दावा करना उचित नहीं।
अर्घ्य कैसे दें: चरण-दर-चरण
- सूर्यास्त से पहले घाट पहुँचें। सूप या दउरे में ठेकुआ, फल, नारियल, ईख और दीया सजा लें।
- व्रती जल में घुटने या कमर तक उतरें — गहराई पहले जाँच लें। संध्या अर्घ्य में मुख पश्चिम की ओर, उषा अर्घ्य में पूर्व की ओर रहता है।
- व्रती दोनों हाथों से प्रसाद-भरा सूप सूर्य देव की ओर उठाएँ और जल में खड़े-खड़े परिक्रमा या प्रणाम करें।
- परिवार के सदस्य लोटे से कच्चा दूध या शुद्ध जल सूप के ऊपर से धीरे-धीरे धार में अर्पित करते हैं — यही अर्घ्य है। कई घरों में हर सूप पर अलग-अलग अर्घ्य दिया जाता है।
- अर्घ्य के समय सूर्य देव और छठी मैया से परिवार, संतान और आरोग्य की मंगलकामना करें; मन में सूर्य मंत्र का स्मरण करें।
- संध्या अर्घ्य के बाद दीये जलाकर घर लौटें; कई परिवार कोसी भरते हैं। भोर में फिर घाट पर आकर उदय की प्रतीक्षा करें और उषा अर्घ्य के बाद पारण करें।
2026 में संध्या और उषा अर्घ्य का समय
कार्तिक शुक्ल षष्ठी 14 नवंबर 23:24 से 16 नवंबर 02:01 तक है, इसलिए संध्या अर्घ्य रविवार 15 नवंबर को और उषा अर्घ्य सोमवार 16 नवंबर की भोर में होगा। रविवार परम्परा से सूर्य देव का वार है — इस वर्ष षष्ठी का संध्या अर्घ्य उसी दिन पड़ना भक्तों के लिए सुखद संयोग है। ज्योतिषीय दृष्टि से दोनों अर्घ्य उस समय होंगे जब सूर्य तुला राशि में हैं; सूर्य 16 नवंबर 19:41 पर वृश्चिक में प्रवेश करेंगे।
| शहर | 15 नवंबर सूर्यास्त | 16 नवंबर सूर्योदय |
|---|---|---|
| पटना | 17:00 | 06:07 |
| वाराणसी | 17:10 | 06:15 |
| कोलकाता | 16:52 | 05:49 |
| नई दिल्ली | 17:27 | 06:44 |
| मुंबई | 18:00 | 06:46 |
| लखनऊ | 17:15 | 06:26 |
| भोपाल | 17:35 | 06:34 |
| प्रयागराज | 17:14 | 06:20 |
| सूरत | 17:57 | 06:49 |
| पुणे | 17:56 | 06:41 |
| बेंगलुरु | 17:49 | 06:18 |
| हैदराबाद | 17:40 | 06:21 |
| चेन्नई | 17:39 | 06:08 |
| अहमदाबाद | 17:55 | 06:53 |
| जयपुर | 17:36 | 06:47 |
| इंदौर | 17:42 | 06:40 |
आरती संग्रह पंचांग-गणना, IST। जिन नगरों के नाम यहाँ नहीं हैं (जैसे रांची, गया, मुज़फ़्फ़रपुर, भागलपुर), वहाँ अपने नगर का सूर्यास्त-सूर्योदय स्थानीय पंचांग से देखें।
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घाट से घर तक: इस भाव को साथ रखें
छठ के बाद भी प्रतिदिन प्रातः ताँबे के लोटे से सूर्य देव को जल अर्पित करना, उनकी आरती गाना या सूर्य चालीसा पढ़ना — यह सरल नियम पर्व की कृतज्ञता को पूरे वर्ष जीवित रखता है। और संध्या अर्घ्य की सीख याद रखें: किसी के ढलते समय में उसका हाथ थामना भी उतनी ही बड़ी पूजा है।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
छठ में पहले डूबते सूर्य देव को अर्घ्य क्यों देते हैं?
संध्या अर्घ्य दिन भर के प्रकाश, फ़सल और जीवन के लिए सूर्य देव के प्रति कृतज्ञता है, और अगली भोर का उषा अर्घ्य नए आरम्भ की प्रार्थना। लोक-भाव में यह ढलते का भी सम्मान करने की सीख है — जो डूबता है, वही फिर उगता है।
2026 में डूबते सूर्य देव को अर्घ्य कब है?
रविवार 15 नवंबर 2026 को, षष्ठी तिथि में। नई दिल्ली में सूर्यास्त 17:27, पटना में 17:00 और कोलकाता में 16:52 पर है।
संध्या अर्घ्य में किस दिशा में मुख करें?
संध्या अर्घ्य में पश्चिम की ओर, डूबते सूर्य देव के सामने, और उषा अर्घ्य में पूर्व की ओर मुख करके जल में खड़े होकर अर्घ्य दिया जाता है।
अर्घ्य जल से दें या दूध से?
दोनों की परम्परा है। प्रायः परिवार के सदस्य लोटे से कच्चा दूध या शुद्ध जल व्रती के हाथ में उठे सूप के ऊपर से धार में अर्पित करते हैं।
क्या उषा और प्रत्यूषा सूर्य देव की पत्नियाँ हैं?
छठ की लोक-मान्यता में उषा को पहली और प्रत्यूषा को अन्तिम किरण मानकर दोनों अर्घ्य उन्हें समर्पित बताए जाते हैं। पुराणों में सूर्य देव की पत्नियों के रूप में प्रायः संज्ञा और छाया का नाम आता है, इसलिए उषा-प्रत्यूषा की व्याख्या को लोक-परम्परा के रूप में समझें।
संदर्भ
ऋग्वेद (उषा सूक्त) · ब्रह्मवैवर्त पुराण (प्रकृति खण्ड — षष्ठी देवी आख्यान) · बिहार, पूर्वांचल और मिथिला की छठ लोक-परम्परा · आरती संग्रह पंचांग-गणना (नई दिल्ली)
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