नरक चतुर्दशी 2026: रूप चौदस की तिथि, 7 सरल उपाय और भूलें
नरक चतुर्दशी (रूप चौदस, छोटी दीपावली) 2026 में दो भागों में है: चतुर्दशी की संध्या का दीपदान शनिवार 7 नवंबर को और मुख्य अभ्यंग स्नान रविवार 8 नवंबर की भोर में, चन्द्रोदय (05:36) से सूर्योदय 06:38 (नई दिल्ली) तक। इस वर्ष उसी 8 नवंबर की शाम दीपावली भी है, इसलिए सुबह स्नान और शाम लक्ष्मी पूजा एक ही दिन होंगे।
एक नज़र में
| चतुर्दशी तिथि | 7 नवंबर 10:48 से 8 नवंबर 11:28 तक |
|---|---|
| अभ्यंग स्नान | रविवार, 8 नवंबर · 05:36–06:38 |
| चतुर्दशी दीपदान | शनिवार, 7 नवंबर · प्रदोष 17:31–20:09 |
| दीपावली | रविवार, 8 नवंबर (उसी दिन शाम) |
| राहुकाल 7 नवंबर | 09:21–10:42 |
2026 में नरक चतुर्दशी की सही तिथि
चतुर्दशी तिथि शनिवार 7 नवंबर को 10:48 पर आरम्भ होकर रविवार 8 नवंबर को 11:28 तक रहती है। नरक चतुर्दशी का मुख्य कर्म अभ्यंग स्नान है, जो धर्मशास्त्र के अनुसार उस भोर में होता है जब सूर्योदय से पहले चतुर्दशी विद्यमान हो। 7 नवंबर की भोर में त्रयोदशी थी, जबकि 8 नवंबर की भोर में चतुर्दशी है — इसलिए स्नान 8 नवंबर को, 05:36 से 06:38 के बीच (नई दिल्ली)।
पर जिस संध्या में चतुर्दशी है, वह 7 नवंबर है। इसलिए यमराज जी के नाम का चतुर्दशी-दीपदान, चौदह दीपक और काली चौदस की परम्पराएँ 7 नवंबर की शाम को निभाएँ। 8 नवंबर की शाम दीपावली की लक्ष्मी पूजा है (नई दिल्ली 17:55–19:51)।
कथा: भगवान श्री कृष्ण, नरकासुर और 16,100 कन्याएँ
श्रीमद्भागवत पुराण के दशम स्कन्ध में कथा है कि प्राग्ज्योतिषपुर का राजा भौमासुर, जिसे नरकासुर कहा जाता है, अत्यन्त अहंकारी हो गया था। उसने देवमाता अदिति के कुण्डल छीन लिए थे और अनेक राज्यों की 16,100 राजकन्याओं को बन्दी बना रखा था। देवताओं की प्रार्थना पर भगवान श्री कृष्ण सत्यभामा जी के साथ गरुड़ पर सवार होकर प्राग्ज्योतिषपुर गए और नरकासुर का वध किया।
बन्दी कन्याओं को मुक्त कराने के बाद जब उन्हें समाज में अपमान का भय हुआ, तब भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें सम्मान देने के लिए स्वीकार किया। यही इस पर्व का मूल भाव है: अन्याय से मुक्ति और स्त्री के सम्मान की रक्षा। लोक-मान्यता है कि नरकासुर ने अन्त समय में यह वर माँगा कि इस तिथि को लोग दीप जलाकर उत्सव मनाएँ, और युद्ध के बाद भगवान ने तेल-उबटन से स्नान किया — इसी से अभ्यंग स्नान की परम्परा जुड़ी मानी जाती है।
एक तिथि, चार नाम
इस चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी नरकासुर-वध के कारण, रूप चौदस भोर के सौंदर्य-स्नान के कारण, छोटी दीपावली दीपावली की पूर्व-संध्या होने के कारण और गुजरात-पश्चिम भारत में काली चौदस कहा जाता है, जहाँ इस रात माँ काली और श्री हनुमान जी की पूजा होती है। नाम अलग हैं, भाव एक: अंधकार और मलिनता को विदा कर प्रकाश का स्वागत।
यम-तर्पण और यम के नाम का दीपदान
धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों में इस चतुर्दशी को स्नान के बाद दक्षिण की ओर मुख करके तिल-मिश्रित जल से यमराज जी के विभिन्न नामों से तर्पण करने का विधान मिलता है। जिनके पिता जीवित हों, वे परिवार की परम्परा के अनुसार इसे करें या न करें। संध्या को घर के बाहर दक्षिण दिशा में यमराज जी के नाम का एक दीपक रखा जाता है। मान्यता है कि यह परिवार की कुशलता और दीर्घायु की प्रार्थना है — डरने की बात नहीं, स्मरण और कृतज्ञता की बात है।
7 सरल और अर्थपूर्ण उपाय
- अभ्यंग स्नान (8 नवंबर भोर): पूरे शरीर पर तिल का तेल लगाएँ, फिर बेसन, हल्दी, चन्दन और थोड़ा दूध मिले उबटन से स्नान करें। सर्दी की भोर है, इसलिए गुनगुना पानी लें; बुज़ुर्ग और बीमार सदस्य सुविधा अनुसार।
- अपामार्ग (चिरचिटा): परम्परा में स्नान के समय अपामार्ग की टहनी सिर के ऊपर से घुमाने का विधान है। यह लोक-मान्यता है कि इससे पाप और दोष दूर होते हैं; पौधा न मिले तो चिन्ता न करें।
- चौदह दीपक (7 नवंबर संध्या): चतुर्दशी के प्रतीक रूप में चौदह दीये घर के अलग-अलग कोनों, रसोई, जल-स्थान, तुलसी माता के पास और द्वार पर रखें।
- यमराज जी के नाम का दीपक: एक चौमुखा या चार बत्ती वाला दीपक प्रदोष काल (नई दिल्ली 17:31–20:09) में घर के बाहर रखें।
- दक्षिण दिशा का दीप: यह दीपक दक्षिण की ओर मुख करके रखा जाता है, क्योंकि परम्परा में दक्षिण यम-दिशा मानी गई है।
- सफ़ाई और कबाड़ निकालना: टूटा सामान, बेकार डिब्बे, पुराने कागज़ आज ही बाहर करें। लोक-मान्यता है कि दरिद्रता को विदा कर अगले दिन माँ लक्ष्मी का स्वागत होता है; व्यवहार में भी साफ़ घर मन को हल्का करता है।
- रूप चौदस का सौंदर्य-स्नान और श्री हनुमान जी की पूजा: स्नान के बाद नए या स्वच्छ वस्त्र, हल्का श्रृंगार — इसीलिए इसे रूप चौदस कहते हैं। 7 नवंबर की रात कई परिवार श्री हनुमान जी की पूजा कर हनुमान चालीसा पढ़ते हैं।
स्नान के बाद कुछ क्षण शान्त बैठकर अपने इष्ट का 108 बार जप करें; जप माला गिनती सँभाल लेगी। जप माला खोलें
इन भूलों से बचें
- गलत दिन स्नान: इस वर्ष अभ्यंग स्नान 7 नवंबर की सुबह नहीं, 8 नवंबर की भोर में है।
- सूर्योदय के बाद स्नान: परम्परा में सूर्योदय (नई दिल्ली 06:38) से पहले का स्नान श्रेष्ठ माना गया है; देर हो जाए तो भी स्नान अवश्य करें, अपराध-बोध न रखें।
- राहुकाल में पूजा आरम्भ: 7 नवंबर को 09:21–10:42 राहुकाल है और उस समय चतुर्दशी भी नहीं; विशेष पूजा संध्या में रखें।
- दीपक की असुरक्षा: घर के बाहर रखा दीपक हवा, पर्दों, सूखे पत्तों और बच्चों की पहुँच से दूर हो; रात भर जलाना हो तो मिट्टी के पात्र में, पानी पास रखकर।
- डर फैलाने वाली बातें: नरक, यमराज जी या अकाल मृत्यु के नाम पर डराने वाली बातों पर ध्यान न दें। यह पर्व प्रकाश, स्वच्छता और कृतज्ञता का है।
- पटाखों में लापरवाही: खुले स्थान पर, बड़ों की देखरेख में, सूती कपड़े पहनकर ही चलाएँ।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
नरक चतुर्दशी 2026 कब है?
अभ्यंग स्नान रविवार 8 नवंबर 2026 की भोर में है (नई दिल्ली 05:36–06:38)। चतुर्दशी की संध्या का दीपदान शनिवार 7 नवंबर को है। चतुर्दशी तिथि 7 नवंबर 10:48 से 8 नवंबर 11:28 तक है।
कुछ कैलेंडर छोटी दिवाली 7 नवंबर क्यों बताते हैं?
चतुर्दशी 7 नवंबर 10:48 से 8 नवंबर 11:28 तक है। इसलिए चतुर्दशी की संध्या — दीपदान, काली चौदस व हनुमान पूजा — 7 नवंबर को है, और अभ्यंग स्नान, जो चतुर्दशी रहते हुए भोर में होता है, 8 नवंबर को। जो कैलेंडर संध्या-दीपदान को आधार मानते हैं वे 7 नवंबर लिखते हैं; दोनों बातें एक ही तिथि के दो अनुष्ठान हैं।
क्या इस बार छोटी दिवाली और दिवाली एक ही दिन हैं?
हाँ, मुख्य कर्मों के हिसाब से। 8 नवंबर की भोर चतुर्दशी में है, इसलिए रूप चौदस का स्नान उसी दिन है, और उसी शाम प्रदोष काल अमावस्या में होने से दीपावली भी 8 नवंबर को है।
नरक चतुर्दशी पर यमराज जी का दीपक कब और कहाँ जलाएँ?
चतुर्दशी की संध्या, यानी 7 नवंबर को प्रदोष काल (नई दिल्ली 17:31–20:09) में, घर के मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके एक चौमुखा दीपक रखें।
रूप चौदस पर स्नान कैसे करें?
सूर्योदय से पहले तिल के तेल की मालिश करें, फिर बेसन-हल्दी-चन्दन के उबटन से गुनगुने पानी में स्नान करें। इसके बाद स्वच्छ वस्त्र पहनकर इष्ट का स्मरण करें।
नरक चतुर्दशी की कथा क्या है?
श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने सत्यभामा जी के साथ नरकासुर का वध कर 16,100 बन्दी राजकन्याओं को मुक्त कराया और उन्हें सम्मान दिया। यह अन्याय पर धर्म की विजय का पर्व है।
अभ्यंग स्नान का सही समय क्या है?
शास्त्र में यह स्नान चतुर्दशी रहते हुए चन्द्रोदय से सूर्योदय के बीच बताया गया है। नई दिल्ली में 8 नवंबर को चन्द्रोदय लगभग 05:36 और सूर्योदय 06:38 पर है — यही स्नान का श्रेष्ठ समय है।
संदर्भ
श्रीमद्भागवत पुराण (दशम स्कन्ध) · धर्मसिन्धु · निर्णयसिन्धु · आरती संग्रह पंचांग-गणना (नई दिल्ली)
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