नवरात्रि दिन २ — माँ ब्रह्मचारिणी

सोमवार, 12 अक्टूबर 2026 · तपस्या का स्वरूप — शिव को पाने हेतु कठोर तप; दाएँ हाथ में जपमाला, बाएँ में कमण्डलु; नंगे पाँव।

ध्यान

दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥

अर्थ: कर-कमलों में जपमाला और कमण्डलु धारण करने वाली सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मचारिणी देवी मुझ पर प्रसन्न हों।

मन्त्र

ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः॥

प्रणाम: ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः। पुष्पं समर्पयामि, नमस्करोमि॥

स्तुति

या देवी सर्वभूतेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

आज का श्लोक — सप्तशती ५.३२–३४

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

अर्थ: जो देवी सब प्राणियों में शक्ति-रूप से स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार।

आज की पूजा

  • रंग — सफ़ेद
  • नैवेद्य — शक्कर / मिश्री
  • पुष्प — चमेली/सफेद पुष्प
  • विधि — नित्य पूजा क्रम; जपमाला से देवी मन्त्र जप।
  • सप्तशती पाठ — अध्याय २–३

नाम-क्रम व स्रोत

  • नाम-क्रम — ब्रह्मचारिणी (नवदुर्गा क्रम २; देवी कवच श्लोक ३–५)
  • मूल — ध्यान-श्लोक: नवदुर्गा पूजा-परम्परा; नाम-क्रम: देवी कवच; श्लोक: दुर्गा सप्तशती (गीताप्रेस क्रमांक)
  • 'या देवी … माँ X रूपेण संस्थिता' स्तुति लोक-प्रचलित रूपान्तर है (मूल सप्तशती में नहीं)। नैवेद्य/पुष्प/रंग लोक-परम्परा हैं, शास्त्रीय विधान नहीं। स्रोत: HinduLab, Dev Aastha (Drik Panchang पद्धति)।

माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा का क्रम

  1. स्नान के बाद दीप जलाकर संकल्प
  2. ध्यान श्लोक — माँ ब्रह्मचारिणी के स्वरूप का स्मरण
  3. मूल मन्त्र का १०८ जप — ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः॥
  4. स्तुति — या देवी सर्वभूतेषु…
  5. दुर्गा सप्तशती पाठ — अध्याय २–३
  6. भोग — शक्कर / मिश्री; वस्त्र का रंग सफ़ेद
  7. आरती — जय अम्बे गौरी
  8. क्षमा प्रार्थना

आज की आरती व पाठ — माँ ब्रह्मचारिणी

यह पाठ कैसे जाँचा गया

तीन स्रोतों से मिलाया: सप्तशती का मूल पाठ (श्लोक-क्रमांक), देवी कवच का नाम-क्रम, और नवदुर्गा की प्रचलित पूजा-पद्धति। भोग सब स्रोतों में एक-से हैं; पुष्प व रंग लोक-परम्परा हैं और क्षेत्र अनुसार बदलते हैं।

  • दुर्गा सप्तशती (मार्कण्डेय पुराण ८१–९३) — श्लोक-पाठ व क्रमांक
  • देवी कवच, श्लोक ३–५ — नवदुर्गा का नाम-क्रम
  • नवदुर्गा पूजा-पद्धति — ध्यान, मन्त्र, स्वरूप, भोग

पारम्परिक सप्त-दिवसीय पाठ-विभाग (१ | २–३ | ४ | ५–८ | ९–१० | ११ | १२–१३) को नौ दिनों में बाँटा गया है — कोई अध्याय बीच में नहीं तोड़ा जाता। अपनी परम्परा का क्रम हो तो वही करें।

आगे-पीछे

इस दिन का पाठ