जटायुकृतश्रीरामस्तोत्रम् (अध्यात्मरामायण 3.8.44-56)

भगवान राम · Ram · स्तोत्र

जटायुकृतश्रीरामस्तोत्रम् (अध्यात्मरामायण 3.8.44-56) — भगवान राम

जटायुकृतश्रीरामस्तोत्रम् (अध्यात्मरामायण 3.8.44-56) के बोल

अगणितगुणमप्रमेयमाद्यं सकलजगत्स्थितिसंयमादिहेतुम्।
उपरमपरमं परात्मभूतं सततमहं प्रणतोऽस्मि रामचन्द्रम्।
निरवधिसुखमिन्दिराकटाक्षं क्षपितसुरेन्द्रचतुर्मुखादिदुःखम्।
नरवरमनिशं नतोऽस्मि रामं वरदमहं वरचापबाणहस्तम्।
त्रिभुवनकमनीयरूपमीड्यं रविशतभासुरमीहितप्रदानम्।
शरणदमनिशं सुरागमूले कृतनिलयं रघुनन्दनं प्रपद्ये।
भवविपिनदवाग्निनामधेयं भवमुखदैवतदैवतं दयालुम्।
दनुजपतिसहस्रकोटिनाशं रवितनयासदृशं हरि प्रपद्ये।
अविरतभवभावनातिदूरं भवविमुखैर्मुनिभिः सदैव दृश्यम्।
भवजलधिसुतारणाङ्घ्रिपोतं शरणमहं रघुनन्दनं प्रपद्ये।
गिरिशगिरिसुतामनोनिवासं गिरिवरधारिणमीहिताभिरामम्।
सुरवरदनुजेन्द्रसेविताङ्घ्रिं सुरवरदं रघुनायकं प्रपद्ये।
परधनपरदारवर्जितानां परगुणभूतिषु तुष्टमानसानाम्।
परहितनिरतात्मनां सुसेव्यं रघुवरमम्बुजलोचनं प्रपद्ये।
स्मितरुचिरविकासिताननाब्जमतिसुलभं सुरराजनीलनीलम्।
सितजलरुहचारुनेत्रशोभं रघुपतिमीशगुरोर्गुरुं प्रपद्ये।
हरिकमलजशम्भुरूपभेदात्त्वमिह विभासि गुणत्रयानुवृत्तः।
रविरिव जलपूरितोदपात्रेष्वमरपतिस्तुतिपात्रमीशमीडे।
रतिपतिशतकोटिसुन्दराङ्गं शतपथगोचरभावनाविदूरम्।
यतिपतिहृदये सदा विभातं रघुपतिमार्तिहरं प्रभुं प्रपद्ये।
इत्येवं स्तुवतस्तस्य प्रसन्नोऽभूद्रघूत्तमः।
उवाच गच्छ भद्रं ते मम विष्णोः परं पदम्।
शृणोति य इदं स्तोत्रं लिखेद्वा नियतः पठेत्।
स याति मम सारूप्यं मरणे मत्स्मृतिं लभेत्।
इति राघवभाषितं तदा श्रुतवान् हर्षसमाकुलो द्विजः।
रघुनन्दनसाम्यमास्थितः प्रययौ ब्रह्मसुपूजितं पदम्।

— स्रोत: गीताप्रेस, स्तोत्ररत्नावली, पृष्ठ 148-151

अगला संबंधित व्रत

भगवान राम से जुड़ा अगला व्रत — शुक्ल पक्ष एकादशी, गुरुवार, 22 अक्टूबर (5 दिन बाद)।

भगवान राम मंत्र जप की विधि

जप सामान्यतः **108 बार** — एक माला — किया जाता है। संकल्प लेकर नित्य एक माला करना, अथवा विशेष कामना हेतु 11, 21 अथवा 108 दिन तक नियमित जप करने का विधान है।

ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटा पूर्व) जप हेतु श्रेष्ठ काल है।

माला: **तुलसी** की माला इस जप हेतु उपयुक्त कही गई है। माला की मणियाँ अंगूठे व मध्यमा से फेरी जाती हैं, तर्जनी का स्पर्श वर्जित है, और सुमेरु (मुख्य मनका) लाँघा नहीं जाता — वहाँ से माला उलटकर अगली आवृत्ति आरम्भ की जाती है।

जप के समय पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख रखें, आसन पर बैठें, और उच्चारण शुद्ध व स्थिर रखें। मन भटके तो गिनती नहीं, स्मरण महत्वपूर्ण है।

भगवान राम के अन्य पाठ