सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं

भगवान विष्णु · Vishnu · स्तोत्र

सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं — भगवान विष्णु

सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं के बोल

सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं
सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणम्।
सहारवक्षःस्थलकौस्तुभश्रियं
नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम्॥
अशेषसंसारविहारहीन-
मादित्यगं पूर्णसुखाभिरामम्।
समस्तसाक्षिं तमसः परस्ता-
ज्जनारायणं विष्णुमहं भजामि॥

सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं — कब पढ़ें

भगवान विष्णु की आराधना का दिन गुरुवार है — अगला गुरुवार, 15 अक्टूबर को।

जप की गिनती हेतु ऑनलाइन जप-माला का उपयोग करें — एक माला अर्थात 108 जप।

गुरु की वर्तमान स्थिति

गुरु इस समय कर्क राशि में हैं, और 31 अक्टू॰ 2026 को सिंह राशि में प्रवेश करेंगे।

ग्रह की स्थिति निरयन (लाहिरी) खगोलीय गणना से — यह प्रतिदिन बदलती है।

अगला संबंधित व्रत

भगवान विष्णु से जुड़ा अगला व्रत — शुक्ल पक्ष एकादशी, गुरुवार, 22 अक्टूबर (13 दिन बाद)।

भगवान विष्णु मंत्र जप की विधि

जप सामान्यतः **108 बार** — एक माला — किया जाता है। संकल्प लेकर नित्य एक माला करना, अथवा विशेष कामना हेतु 11, 21 अथवा 108 दिन तक नियमित जप करने का विधान है।

ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटा पूर्व) जप हेतु श्रेष्ठ काल है; भगवान विष्णु की आराधना का वार गुरुवार है, अतः उस दिन का जप विशेष फलदायी माना जाता है।

माला: **तुलसी** की माला इस जप हेतु उपयुक्त कही गई है। माला की मणियाँ अंगूठे व मध्यमा से फेरी जाती हैं, तर्जनी का स्पर्श वर्जित है, और सुमेरु (मुख्य मनका) लाँघा नहीं जाता — वहाँ से माला उलटकर अगली आवृत्ति आरम्भ की जाती है।

जप के समय पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख रखें, आसन पर बैठें, और उच्चारण शुद्ध व स्थिर रखें। मन भटके तो गिनती नहीं, स्मरण महत्वपूर्ण है।

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