शारदा भुजंग प्रयात स्तोत्र (शंकराचार्य)

माँ सरस्वती · Saraswati · स्तोत्र

शारदा भुजंग प्रयात स्तोत्र (शंकराचार्य) — माँ सरस्वती

शारदा भुजंग प्रयात स्तोत्र (शंकराचार्य) के बोल

सुवक्षोजकुम्भाम् सुधापूर्णकुम्भाम्
प्रसादावलम्बाम् प्रपुण्यावलम्बाम्।
सदास्यन्दमानाम् सरस्वतीं नौमि।
जगन्माता शारदां सुन्दरीं च॥

कुचाभ्यां नतांगीं कुचाभ्यामनूह्याम्
स्फुरत्काञ्चनाभां कनत्काञ्चनाभाम्।
अनन्तामनन्तस्वयं भावयन्तीम्
शारदाम्बां सुन्दरीं भावयामि॥

सरस्वत्यै नमो नित्यं भद्रकाल्यै नमो नमः।
वेदवेदाङ्गवेदान्तविद्यास्थानेभ्य एव च॥

एषा प्रसन्नवदना मधुभाषणेन
संसेव्यमाना सुकवीन्द्रदृष्टा।
हंसस्य पृष्ठे कमलादियुक्ता
विद्याधरी मां प्रणतं प्रसादत्॥

वागीश्वरी कीर्तिधरी महाविद्या
ब्राह्म्यात्मिका ब्रह्मसरस्वती च।
ऐं ह्रीं क्लीं वागीशी विद्यावती
शारदा मां पातु सदा भव सागरे॥

— स्रोत: आदि शंकराचार्य कृत — शारदाभुजंग स्तोत्र परम्परा

माँ सरस्वती मंत्र जप की विधि

जप सामान्यतः **108 बार** — एक माला — किया जाता है। संकल्प लेकर नित्य एक माला करना, अथवा विशेष कामना हेतु 11, 21 अथवा 108 दिन तक नियमित जप करने का विधान है।

ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटा पूर्व) जप हेतु श्रेष्ठ काल है।

माला: **स्फटिक अथवा श्वेत चन्दन** की माला इस जप हेतु उपयुक्त कही गई है। माला की मणियाँ अंगूठे व मध्यमा से फेरी जाती हैं, तर्जनी का स्पर्श वर्जित है, और सुमेरु (मुख्य मनका) लाँघा नहीं जाता — वहाँ से माला उलटकर अगली आवृत्ति आरम्भ की जाती है।

जप के समय पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख रखें, आसन पर बैठें, और उच्चारण शुद्ध व स्थिर रखें। मन भटके तो गिनती नहीं, स्मरण महत्वपूर्ण है।

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