दामोदराष्टकम्
भगवान कृष्ण · Krishna · स्तोत्र
दामोदराष्टकम् के बोल
नमामीश्वरं सच्चिदानन्दरूपं
लसत्कुण्डलं गोकुले भ्राजमानम्।
यशोदाभियोलूखलाद्धावमानं
परामृष्टमत्यन्ततो द्रुत्य गोप्या॥
रुदन्तं मुहुर्नेत्रयुग्मं मृजन्तं
करांभोजयुग्मेन सातङ्कनेत्रम्।
मुहुः श्वासकम्पत्रिरेखाङ्कणठं
भजेऽहं भवानीभवं नाभिमुक्तम्॥
इतीदृक् स्वलीलाभिरानन्दकुण्डे
स्वघोषं निमज्जन्तमाख्यापयन्तम्।
तदीयेषितज्ञेषु भक्तैर्जितत्वं
पुनः प्रेमतस्तं शतावृत्ति वन्दे॥
वरं देव मोक्षं न मोक्षावधिं वा
न चान्यं वृणेऽहं वरेशादपीह।
इदं ते वपुर्नाथ गोपालबालं
सदा मे मनस्याविरास्तां किमन्यैः॥
इदं ते मुखाम्भोजमत्यन्तनीलैर्
वृतं कुन्तलैः स्निग्धरक्तैश्च गोप्या।
मुहुश्चुम्बितं बिम्बरक्ताधरं मे
मनस्याविरास्तामलं लक्ष हेतुभिः॥
नमो देवदेवाय देवकीनन्दनाय।
नमश्च प्रद्युम्नाय रुक्मिणीरमणाय।
नमो गोपगोपीश गोवर्धनाय।
नमो यादवानां पतये नमस्ते॥
श्रितकमलकुचमण्डलं धृत कुण्डलं
त्रिभुवन भावनकुण्डलम्।
अहिमकुण्डलमातङ्गकुण्डलं
भज गोविन्दं गोविन्दं भज गोविन्दम्॥
नमस्ते स्तुते परम ब्रह्मणे।
पुरुषोत्तम गोविन्द नमोऽस्तु ते।
श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारे।
हे नाथ नारायण वासुदेव॥
— स्रोत: परम्परागत (Traditional)
अगला संबंधित व्रत
भगवान कृष्ण से जुड़ा अगला व्रत — शुक्ल पक्ष एकादशी, रविवार, 23 अगस्त (5 दिन बाद)।
भगवान कृष्ण मंत्र जप की विधि
जप सामान्यतः **108 बार** — एक माला — किया जाता है। संकल्प लेकर नित्य एक माला करना, अथवा विशेष कामना हेतु 11, 21 अथवा 108 दिन तक नियमित जप करने का विधान है।
ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटा पूर्व) जप हेतु श्रेष्ठ काल है।
माला: **तुलसी** की माला इस जप हेतु उपयुक्त कही गई है। माला की मणियाँ अंगूठे व मध्यमा से फेरी जाती हैं, तर्जनी का स्पर्श वर्जित है, और सुमेरु (मुख्य मनका) लाँघा नहीं जाता — वहाँ से माला उलटकर अगली आवृत्ति आरम्भ की जाती है।
जप के समय पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख रखें, आसन पर बैठें, और उच्चारण शुद्ध व स्थिर रखें। मन भटके तो गिनती नहीं, स्मरण महत्वपूर्ण है।