गोविन्दाष्टकम् (शंकराचार्य)
भगवान कृष्ण · Krishna · स्तोत्र
गोविन्दाष्टकम् (शंकराचार्य) के बोल
सत्यं ज्ञानमनन्तं नित्यमनाकाशं परमाकाशम्।
गोष्ठप्राङ्गणरिङ्खणलोलमनायासं परमायासम्।
मायाकल्पितनानाकारमनाकारं भुवनाकारम्।
क्ष्माया नाथमनाथं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम्॥
मृत्स्नामत्सीहेति यशोदाताडनशैशवसन्त्रासम्।
व्यादितवक्त्रालोकितलोकालोकचतुर्दशलोकालीम्।
लोकत्रयपुरमूलस्तम्भं लोकालोकमनालोकम्।
लोकेशं परमेशं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम्॥
त्रैविष्टपरिपोविष्टवपुरेकंभुवनैकम्।
भूनिर्मथनमहाबाहुमहाबाहुसुतंभूरि।
वन्देऽहं वासुदेवं तं श्रीवत्साङ्कितवक्षसम्।
शंखचक्रगदापद्मधारिणं पीतवाससम्॥
गोपालं भूपालं कालियदमन रसिकगोपालम्।
कालिन्दीतटकेलिकुतूहलमानसगोपालम्।
गोवर्धनधरणोत्तुङ्गं गोकुलरक्षणसतुङ्गम्।
गोपागोपीनायकगोविन्दं प्रणमत परमानन्दम्॥
राधे जय जय माधव राधे। जय जय राधे जय जय माधव।
कुंजबिहारी श्री गिरिधारी जय यमुना के तट पर।
वृन्दावन के राजा कृष्ण जय राधे जय जय माधव॥
नमो नमस्ते वासुदेव श्रीकृष्ण गोविन्द।
नमो नमस्ते नन्दनन्दन परमानन्द।
नमो नमस्ते मुरलीधर वृन्दावनबिहारी।
नमो नमस्ते राधावल्लभ भक्तजनतारी॥
— स्रोत: परम्परागत (Traditional)
अगला संबंधित व्रत
भगवान कृष्ण से जुड़ा अगला व्रत — शुक्ल पक्ष एकादशी, रविवार, 23 अगस्त (5 दिन बाद)।
भगवान कृष्ण मंत्र जप की विधि
जप सामान्यतः **108 बार** — एक माला — किया जाता है। संकल्प लेकर नित्य एक माला करना, अथवा विशेष कामना हेतु 11, 21 अथवा 108 दिन तक नियमित जप करने का विधान है।
ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटा पूर्व) जप हेतु श्रेष्ठ काल है।
माला: **तुलसी** की माला इस जप हेतु उपयुक्त कही गई है। माला की मणियाँ अंगूठे व मध्यमा से फेरी जाती हैं, तर्जनी का स्पर्श वर्जित है, और सुमेरु (मुख्य मनका) लाँघा नहीं जाता — वहाँ से माला उलटकर अगली आवृत्ति आरम्भ की जाती है।
जप के समय पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख रखें, आसन पर बैठें, और उच्चारण शुद्ध व स्थिर रखें। मन भटके तो गिनती नहीं, स्मरण महत्वपूर्ण है।