कृष्णाष्टकम्

भगवान कृष्ण · Krishna · स्तोत्र

कृष्णाष्टकम् — भगवान कृष्ण

कृष्णाष्टकम् के बोल

वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्।
देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥

अतसीपुष्पसंकाशं हारनूपुरशोभितम्।
रत्नकङ्कणकेयूरं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥

कुटिलालकसंयुक्तं पूर्णचन्द्रनिभाननम्।
विलसत्कुण्डलधरं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥

मन्दारगन्धसंयुक्तं चारुहासं चतुर्भुजम्।
बर्हिपिञ्छावचूडाङ्गं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥

उत्फुल्लपद्मपत्राक्षं नीलजीमूतसन्निभम्।
यादवानां शिरोरत्नं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥

रुक्मिणीकेलिसंयुक्तं पीताम्बरसुशोभितम्।
अवाप्ततुलसीगन्धं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥

गोपिकानां कुचद्वन्द्वकुङ्कुमाङ्कितवक्षसम्।
श्रीनिकेतनं महेष्वासं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥

श्रीवत्साङ्कं महोरस्कं वनमालाविराजितम्।
शङ्खचक्रधरं देवं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥

— स्रोत: परम्परागत (Traditional)

अगला संबंधित व्रत

भगवान कृष्ण से जुड़ा अगला व्रत — शुक्ल पक्ष एकादशी, रविवार, 23 अगस्त (5 दिन बाद)।

भगवान कृष्ण मंत्र जप की विधि

जप सामान्यतः **108 बार** — एक माला — किया जाता है। संकल्प लेकर नित्य एक माला करना, अथवा विशेष कामना हेतु 11, 21 अथवा 108 दिन तक नियमित जप करने का विधान है।

ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटा पूर्व) जप हेतु श्रेष्ठ काल है।

माला: **तुलसी** की माला इस जप हेतु उपयुक्त कही गई है। माला की मणियाँ अंगूठे व मध्यमा से फेरी जाती हैं, तर्जनी का स्पर्श वर्जित है, और सुमेरु (मुख्य मनका) लाँघा नहीं जाता — वहाँ से माला उलटकर अगली आवृत्ति आरम्भ की जाती है।

जप के समय पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख रखें, आसन पर बैठें, और उच्चारण शुद्ध व स्थिर रखें। मन भटके तो गिनती नहीं, स्मरण महत्वपूर्ण है।

भगवान कृष्ण के अन्य पाठ