कृष्णाष्टकम् (शङ्कराचार्य)
भगवान शिव · Shiva · स्तोत्र
कृष्णाष्टकम् (शङ्कराचार्य) के बोल
श्रियाश्लिष्टो विष्णुः स्थिरचरवपुर्वेदविषयो
धियां साक्षी शुद्धो हरिरसुरहन्ताब्जनयनः।
गदी शङ्खी चक्री विमलवनमाली स्थिररुचिः
शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषयः॥
यतः सर्वं जातं वियदनिलमुख्यं जगदिदं
स्थितौ निःशेषं योऽवति निजसुखांशेन मधुहा।
लये सर्वं स्वस्मिन् हरति कलया यस्तु स विभुः। शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषयः॥
असूनायम्यादौ यमनियममुख्यैः सुकरणै-
र्निरुध्येदं चित्तं हृदि विमलमानीय सकलम्।
यमीड्यं पश्यन्ति प्रवरमतयो मायिनमसौ। शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषयः॥
पृथिव्यां तिष्ठन् यो यमयति महीं वेद न धरा
यमित्यादौ वेदो वदति जगतामीशममलम्।
नियन्तारं ध्येयं मुनिसुरनृणां मोक्षदमसौ। शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषयः॥
महेन्द्रादिर्देवो जयति दितिजान्यस्य बलतो
न कस्य स्वातन्त्र्यं क्वचिदपि कृतौ यत्कृतिमृते।
कवित्वादेर्गर्वं परिहरति योऽसौ विजयिनः। शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषयः॥
विना यस्य ध्यानं व्रजति पशुतां सूकरमुखां
विना यस्य ज्ञानं जनिमृतिभयं याति जनता।
विना यस्य स्मृत्या कृमिशतजनिं याति स विभुः। शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषयः॥
नरातङ्कोत्तङ्कः शरणशरणो भ्रान्तिहरणो
घनश्यामः कामो व्रजशिशुवयस्योऽर्जुनसखः।
स्वयम्भूर्भूतानां जनक उचिताचारसुखदः। शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषयः॥
यदा धर्मग्लानिर्भवति जगतां क्षोभकरणी
तदा लोकस्वामी प्रकटितवपुः सेतुधृगजः।
सतां धाता स्वच्छो निगमगणगीतो व्रजपतिः। शरण्यो लोकेशो मम भवतु कृष्णोऽक्षिविषयः॥
इति हरिरखिलात्माराधितः शङ्करेण
श्रुतिविशदगुणोऽसौ मातृमोक्षार्थमाद्यः।
यतिवरनिकटे श्रीयुक्त आविर्बभूव
स्वगुणवृत उदारः शङ्खचक्राब्जहस्तः॥
— स्रोत: गीताप्रेस, स्तोत्ररत्नावली, पृष्ठ 183-186
कृष्णाष्टकम् (शङ्कराचार्य) — कब पढ़ें
भगवान शिव की आराधना का दिन सोमवार है — अगला सोमवार, 19 अक्टूबर को।
जप की गिनती हेतु ऑनलाइन जप-माला का उपयोग करें — एक माला अर्थात 108 जप।
अगला संबंधित व्रत
भगवान शिव से जुड़ा अगला व्रत — शुक्ल प्रदोष, शुक्रवार, 23 अक्टूबर (6 दिन बाद)।
अन्य: मासिक शिवरात्रि — शनिवार, 7 नवंबर।
भगवान शिव मंत्र जप की विधि
जप सामान्यतः **108 बार** — एक माला — किया जाता है। संकल्प लेकर नित्य एक माला करना, अथवा विशेष कामना हेतु 11, 21 अथवा 108 दिन तक नियमित जप करने का विधान है।
ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटा पूर्व) जप हेतु श्रेष्ठ काल है; भगवान शिव की आराधना का वार सोमवार है, अतः उस दिन का जप विशेष फलदायी माना जाता है।
माला: **रुद्राक्ष** की माला इस जप हेतु उपयुक्त कही गई है। माला की मणियाँ अंगूठे व मध्यमा से फेरी जाती हैं, तर्जनी का स्पर्श वर्जित है, और सुमेरु (मुख्य मनका) लाँघा नहीं जाता — वहाँ से माला उलटकर अगली आवृत्ति आरम्भ की जाती है।
जप के समय पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख रखें, आसन पर बैठें, और उच्चारण शुद्ध व स्थिर रखें। मन भटके तो गिनती नहीं, स्मरण महत्वपूर्ण है।