श्रीनन्दकुमाराष्टकम् (वल्लभाचार्य)

भगवान कृष्ण · Krishna · स्तोत्र

श्रीनन्दकुमाराष्टकम् (वल्लभाचार्य) — भगवान कृष्ण

श्रीनन्दकुमाराष्टकम् (वल्लभाचार्य) के बोल

सुन्दरगोपालम् उरवनमालं नयनविशालं दुःखहरम्।
वृन्दावनचन्द्रमानन्दकन्दं परमानन्दं धरणिधरम्॥
वल्लभघनश्यामं पूर्णकामम् अत्यभिरामं प्रीतिकरम्।
भज नन्दकुमारं सर्वसुखसारं तत्त्वविचारं ब्रह्मपरम्।
सुन्दरवारिजवदनं निर्जितमदनम् आनन्दसदनं मुकुटधरम्।
गुञ्जाकृतिहारं विपिनविहारं परमोदारं चीरहरम्॥
वल्लभपटपीतं कृतउपवीतं करनवनीतं विबुधवरं। भज नन्दकुमारं सर्वसुखसारं तत्त्वविचारं ब्रह्मपरम्।
शोभितमुखधूलं यमुनाकूलं निपटअतूलं सुखदतरम्।
मुखमण्डितरेणुं चारितधेनुं वादितवेणुं मधुरसुरम्॥
वल्लभमतिविमलं शुभपदकमलं नखरुचिअमलं तिमिरहरं। भज नन्दकुमारं सर्वसुखसारं तत्त्वविचारं ब्रह्मपरम्
शिरमुकुटसुदेशं कुञ्चितकेशं नटवरवेशं कामवरम्।
मायाकृतमनुजं हलधरअनुजं प्रतिहतदनुजं भारहरम्॥
वल्लभव्रजपालं सुभगसुचालं हितमनुकालं भाववरं। भज नन्दकुमारं सर्वसुखसारं तत्त्वविचारं ब्रह्मपरम्।
इन्दीवरभासं प्रकटसुरासं कुसुमविकासं वंशिधरम्।
हतमन्मथमानं रूपनिधानं कृतकलगानं चित्तहरम्॥
वल्लभमृदुहासं कुञ्जनिवासं विविधविलासं केलिकरं। भज नन्दकुमारं सर्वसुखसारं तत्त्वविचारं ब्रह्मपरम्।
अतिपरप्रवीणं पालितदीनं भक्ताधीनं कर्मकरम्।
मोहनमतिधीरं फणिबलवीरं हतपरवीरं तरलतरम्॥
वल्लभव्रजरमणं वारिजवदनं हलधरशमनं शैलधरं। भज नन्दकुमारं सर्वसुखसारं तत्त्वविचारं ब्रह्मपरम्।
जलधरद्युतिअङ्गं ललितत्रिभङ्गं बहुकृतरङ्गं रसिकवरम्।
गोकुलपरिवारं मदनाकारं कुञ्जविहारं गूढतरम्॥
वल्लभव्रजचन्द्रं सुभगसुछन्दं कृतआनन्दं भ्रान्तिहरं। भज नन्दकुमारं सर्वसुखसारं तत्त्वविचारं ब्रह्मपरम्।
वन्दितयुगचरणं पावनकरणं जगदुद्धरणं विमलधरम्।
कालियशिरगमनं कृतफणिनमनं घातितयमनं मृदुलतरम्॥
वल्लभदुःखहरणं निर्मलचरणम् अशरणशरणं मुक्तिकरं। भज नन्दकुमारं सर्वसुखसारं तत्त्वविचारं ब्रह्मपरम्।

— स्रोत: गीताप्रेस, स्तोत्ररत्नावली, पृष्ठ 216-218

अगला संबंधित व्रत

भगवान कृष्ण से जुड़ा अगला व्रत — शुक्ल पक्ष एकादशी, गुरुवार, 22 अक्टूबर (5 दिन बाद)।

भगवान कृष्ण मंत्र जप की विधि

जप सामान्यतः **108 बार** — एक माला — किया जाता है। संकल्प लेकर नित्य एक माला करना, अथवा विशेष कामना हेतु 11, 21 अथवा 108 दिन तक नियमित जप करने का विधान है।

ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटा पूर्व) जप हेतु श्रेष्ठ काल है।

माला: **तुलसी** की माला इस जप हेतु उपयुक्त कही गई है। माला की मणियाँ अंगूठे व मध्यमा से फेरी जाती हैं, तर्जनी का स्पर्श वर्जित है, और सुमेरु (मुख्य मनका) लाँघा नहीं जाता — वहाँ से माला उलटकर अगली आवृत्ति आरम्भ की जाती है।

जप के समय पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख रखें, आसन पर बैठें, और उच्चारण शुद्ध व स्थिर रखें। मन भटके तो गिनती नहीं, स्मरण महत्वपूर्ण है।

भगवान कृष्ण के अन्य पाठ