राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र (सम्पूर्ण)

भगवान कृष्ण · Krishna · स्तोत्र

राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र (सम्पूर्ण) — भगवान कृष्ण

राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र (सम्पूर्ण) के बोल

मुनीन्द्रवृन्दवन्दिते त्रिलोकशोकहारिणि,
प्रसन्नवक्त्रपङ्कजे निकुञ्जभूविलासिनि।
व्रजेन्द्रभानुनन्दिनि व्रजेन्द्रसूनुसङ्गते,
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम्॥१॥

अशोकवृक्षवल्लरीवितानमण्डपस्थिते,
प्रवालबालपल्लवप्रभारुणाङ्घ्रिकोमले।
वराभयस्फुरत्करे प्रभूतसम्पदालये,
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम्॥२॥

अनङ्गरङ्गमङ्गलप्रसङ्गभङ्गुरभ्रुवां,
सविभ्रमं ससम्भ्रमं दृगन्तबाणपातनैः।
निरन्तरं वशीकृतप्रतीतनन्दनन्दने,
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम्॥३॥

तडित्सुवर्णचम्पकप्रदीप्तगौरविग्रहे,
मुखप्रभापरास्तकोटिशारदेन्दुमण्डले।
विचित्रचित्रसञ्चरच्चकोरशावलोचने,
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम्॥४॥

मदोन्मदातियौवने प्रमोदमानमण्डिते,
प्रियानुरागरञ्जिते कलाविलासपण्डिते।
अनन्यधन्यकुञ्जराज्यकामकेलिकोविदे,
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम्॥५॥

अशेषहावभावधीरहीरहारभूषिते,
प्रभूतशातकुम्भकुम्भकुम्भिकुम्भसुस्तनि।
प्रशस्तमन्दहास्यचूर्णपूर्णसौख्यसागरे,
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम्॥६॥

मृणालवालवल्लरीतरङ्गरङ्गदोर्लते,
लताग्रलास्यलोलनीललोचनावलोकने।
ललल्लुलन्मिलन्मनोज्ञमुग्धमोहिनाश्रिते,
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम्॥७॥

सुवर्णमलिकाञ्चितत्रिरेखकम्बुकण्ठगे,
त्रिसूत्रमङ्गलीगुणत्रिरत्नदीप्तिदीधिते।
सलोलनीलकुन्तलप्रसूनगुच्छगुम्फिते,
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम्॥८॥

नितम्बबिम्बलम्बमानपुष्पमेखलागुणे,
प्रशस्तरत्नकिङ्किणीकलापमध्यमञ्जुले।
करीन्द्रशुण्डदण्डिकावरोहसौभगोरुके,
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम्॥९॥

अनेकमन्त्रनादमञ्जुनूपुरारवस्खलत्,
समाजराजहंसवंशनिक्वणातिगौरवे।
विलोलहेमवल्लरीविडम्बिचारुचङ्क्रमे,
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम्॥१०॥

अनन्तकोटिविष्णुलोकनम्रपद्मजार्चिते,
हिमाद्रिजापुलोमजाविरिञ्चजावरप्रदे।
अपारसिद्धिऋद्धिदिग्धसत्पदाङ्गुलीनखे,
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम्॥११॥

मखेश्वरि क्रियेश्वरि स्वधेश्वरि सुरेश्वरि,
त्रिवेदभारतीश्वरि प्रमाणशासनेश्वरि।
रमेश्वरि क्षमेश्वरि प्रमोदकाननेश्वरि,
व्रजेश्वरि व्रजाधिपे श्रीराधिके नमोऽस्तुते॥१२॥

इति ममद्भुतं स्तवं निशम्य भानुनन्दिनी,
करोतु सन्ततं जनं कृपाकटाक्षभाजनम्।
भवेत्तदैव सञ्चितत्रिरूपकर्मनाशनं,
लभेत्तदा व्रजेन्द्रसूनुमण्डलप्रवेशनम्॥१३॥

॥ फलश्रुति ॥
राकायां च सिताष्टम्यां दशम्यां च विशुद्धधीः।
एकादश्यां त्रयोदश्यां यः पठेत्साधकः सुधीः॥१४॥
यं यं कामयते कामं तं तमाप्नोति साधकः।
राधाकृपाकटाक्षेण भक्तिःस्यात् प्रेमलक्षणा॥१५॥
ऊरुदघ्ने नाभिदघ्ने हृद्दघ्ने कण्ठदघ्नके।
राधाकुण्डजले स्थिता यः पठेत् साधकः शतम्॥१६॥
तस्य सर्वार्थसिद्धिः स्याद् वाक्सामर्थ्यं तथा लभेत्।
ऐश्वर्यं च लभेत् साक्षाद्दृशा पश्यति राधिकाम्॥१७॥
तेन स तत्क्षणादेव तुष्टा दत्ते महावरम्।
येन पश्यति नेत्राभ्यां तत् प्रियं श्यामसुन्दरम्॥१८॥
नित्यलीलाप्रवेशं च ददाति श्रीव्रजाधिपः।
अतः परतरं प्रार्थ्यं वैष्णवस्य न विद्यते॥१९॥

॥ इति श्रीमदूर्ध्वाम्नाये श्रीराधिकायाः कृपाकटाक्षस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

अगला संबंधित व्रत

भगवान कृष्ण से जुड़ा अगला व्रत — शुक्ल पक्ष एकादशी, रविवार, 23 अगस्त (5 दिन बाद)।

भगवान कृष्ण मंत्र जप की विधि

जप सामान्यतः **108 बार** — एक माला — किया जाता है। संकल्प लेकर नित्य एक माला करना, अथवा विशेष कामना हेतु 11, 21 अथवा 108 दिन तक नियमित जप करने का विधान है।

ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटा पूर्व) जप हेतु श्रेष्ठ काल है।

माला: **तुलसी** की माला इस जप हेतु उपयुक्त कही गई है। माला की मणियाँ अंगूठे व मध्यमा से फेरी जाती हैं, तर्जनी का स्पर्श वर्जित है, और सुमेरु (मुख्य मनका) लाँघा नहीं जाता — वहाँ से माला उलटकर अगली आवृत्ति आरम्भ की जाती है।

जप के समय पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख रखें, आसन पर बैठें, और उच्चारण शुद्ध व स्थिर रखें। मन भटके तो गिनती नहीं, स्मरण महत्वपूर्ण है।

भगवान कृष्ण के अन्य पाठ