श्रीकृष्णाष्टक (जगन्नाथ पण्डित कृत)

भगवान कृष्ण · Krishna · स्तोत्र

श्रीकृष्णाष्टक (जगन्नाथ पण्डित कृत) — भगवान कृष्ण

श्रीकृष्णाष्टक (जगन्नाथ पण्डित कृत) के बोल

भज भज हे मन श्रीनन्दनन्दन अभय-चरणारविन्द रे।
दुर्लभ मानव जन्म सत्संगे तरहु ए भवसिन्धु रे॥

श्री कृष्ण करुणासिन्धु दीनबन्धु जगत्पते।
गोपेश गोपिकाकान्त राधाकान्त नमोऽस्तु ते॥

नन्दनन्दन श्रीकृष्ण पार्थसारथे नमोऽस्तु ते।
यशोदावत्सल गोविन्द मधुरिपो नमोऽस्तु ते॥

चन्द्रशेखरनुत श्याम गोकुलानन्द केशव।
कंसारे मधुरानाथ वासुदेव नमोऽस्तु ते॥

कृपया पालय मां देव श्रीमन्नारायण अव्यय।
देवकीनन्दन गोविन्द वासुदेव नमोऽस्तु ते॥

— स्रोत: जगन्नाथ पण्डित कृत — अष्टक परम्परा

अगला संबंधित व्रत

भगवान कृष्ण से जुड़ा अगला व्रत — शुक्ल पक्ष एकादशी, गुरुवार, 22 अक्टूबर (13 दिन बाद)।

भगवान कृष्ण मंत्र जप की विधि

जप सामान्यतः **108 बार** — एक माला — किया जाता है। संकल्प लेकर नित्य एक माला करना, अथवा विशेष कामना हेतु 11, 21 अथवा 108 दिन तक नियमित जप करने का विधान है।

ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटा पूर्व) जप हेतु श्रेष्ठ काल है।

माला: **तुलसी** की माला इस जप हेतु उपयुक्त कही गई है। माला की मणियाँ अंगूठे व मध्यमा से फेरी जाती हैं, तर्जनी का स्पर्श वर्जित है, और सुमेरु (मुख्य मनका) लाँघा नहीं जाता — वहाँ से माला उलटकर अगली आवृत्ति आरम्भ की जाती है।

जप के समय पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख रखें, आसन पर बैठें, और उच्चारण शुद्ध व स्थिर रखें। मन भटके तो गिनती नहीं, स्मरण महत्वपूर्ण है।

भगवान कृष्ण के अन्य पाठ