श्रीकृष्णः शरणं मम (कृष्णलालद्विज)

भगवान कृष्ण · Krishna · स्तोत्र

श्रीकृष्णः शरणं मम (कृष्णलालद्विज) — भगवान कृष्ण

श्रीकृष्णः शरणं मम (कृष्णलालद्विज) के बोल

श्रीकृष्ण एव शरणं मम श्रीकृष्ण एव शरणम्॥
गुणमय्येषा न यत्र माया न च जनुरपि मरणम्।
यद्यतयः पश्यन्ति समाधौ परममुदाभरणम्॥
यद्धेतोर्निर्वहन्ति बुधा ये जगति सदाचरणम्।
सर्वापद्भ्यो विहितं महतां येन समुद्धरणम्॥
भगवति यत्सन्मतिमुद्वहतां हृदयतमोहरणम्।
हरिपरमा यद्भजन्ति सततं निषेव्य गुरुचरणम्॥
असुरकुलक्षतये कृतममरैर्यस्य सदादरणम्।
भुवनतरुं धत्ते यन्निखिलं विविधविषयपर्णम्॥
अवाप्य यद्भूयोऽच्युतभक्ता न यान्ति संसरणम्।
कृष्णलालजीद्विजस्य भूयात्तदघहरस्मरणम्॥

— स्रोत: गीताप्रेस, स्तोत्ररत्नावली, पृष्ठ 211-212

अगला संबंधित व्रत

भगवान कृष्ण से जुड़ा अगला व्रत — शुक्ल पक्ष एकादशी, गुरुवार, 22 अक्टूबर (5 दिन बाद)।

भगवान कृष्ण मंत्र जप की विधि

जप सामान्यतः **108 बार** — एक माला — किया जाता है। संकल्प लेकर नित्य एक माला करना, अथवा विशेष कामना हेतु 11, 21 अथवा 108 दिन तक नियमित जप करने का विधान है।

ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटा पूर्व) जप हेतु श्रेष्ठ काल है।

माला: **तुलसी** की माला इस जप हेतु उपयुक्त कही गई है। माला की मणियाँ अंगूठे व मध्यमा से फेरी जाती हैं, तर्जनी का स्पर्श वर्जित है, और सुमेरु (मुख्य मनका) लाँघा नहीं जाता — वहाँ से माला उलटकर अगली आवृत्ति आरम्भ की जाती है।

जप के समय पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख रखें, आसन पर बैठें, और उच्चारण शुद्ध व स्थिर रखें। मन भटके तो गिनती नहीं, स्मरण महत्वपूर्ण है।

भगवान कृष्ण के अन्य पाठ